ग़ज़ल

मैं कहाँ कुछ हूँ कलन्दर है वही।
सिर्फ कतरा हूँ समन्दर है वही।।
उसको हर अच्छे बुरे का इल्म है
जानता है जोे   धुरंधर है वही ।।
आशिकी का भी अज़ब अंदाज़ है
हारता है जो सिकन्दर है वही।।
हाँ गुरु बनने से जिसको उज़्र है
वो ही आलिम है,मछिन्दर है वही।।
कोई मक़तल है मुहब्बत जानिये
सिर दिया जिसने भी अंदर है वही।।

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