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Showing posts from 2015

सिर्फ़ सच बोलने से डरता हूँ।।

ये करिश्मा मैं खूब करता हूँ।
रोज जीता हूँ रोज मरता हूँ।।
यूँ तो मुझको कोई भी खौफ नहीं
सिर्फ़ सच बोलने से डरता हूँ।।
मेरी पहचान ये नहीं फिर भी
क्यों इसे ओढ़ता पहनता हूँ।।
मेरा कातिल है कोई गैर नहीं
खूबियां उसकी मैं समझता हूँ।।
मेरी दुनिया मेरा दिमाग औ दिल
और इसमें भी मैं भटकता हूँ।।
मैं कहीं भी सहज नहीं होता
मैं मुझे ही बहुत अखरता हूँ।।
जागने पर उजाड़ सा क्यों हूँ
रोज मैं नींद में सँवरता हूँ।।
कोई मेरा पता बता दे मुझे
मैं गली दर गली गुजरता हूँ।।
लौटकर आता हूँ घर हारे जुवारी की तरह।
जब किसी के पास जाता हूँ भिखारी की तरह।। मैं सियासत के किसी भी कोण से लायक नहीं
इस्तेमाल होता हूँ मैं हरदम अनारी की तरह।। मैं कबूतर हूँ कोई दुनिया के इस बाजार में
लोग दिखते देखते हैं ज्यूँ शिकारी की तरह।। चलती फिरती पुतलियाँ हैं हम उसी के हाथ की
जो नचाता है सदा सबको मदारी की तरह।।
मुझे मंदिर मुझे मस्जिद मुझे गिरजा न जाने दो।
जहाँ इंसान बसते हों ,वहीँ पर घर बनाने दो।। समझते हों जहाँ पर लोग केवल प्रेम की भाषा
वहीँ पर मौन रहकर गुनगुनाने मुस्कुराने दो।। न उसको रोकना बेहतर न उसको टोकना अच्छा
अगर आता है आने दो नहीं आता है जाने दो।। हमारी उम्र आधी कट चुकी है तुमको मालूम है
न सोचो अब तो बंधन वर्जनाएं टूट जाने दो।। मुझे झूठी तसल्ली दी सभी ने ये ही कह कह कर
तुम्हारा है तो आएगा वो जाता है तो जाने दो।।
मेरे दिल से भला क्या वास्ता है।
तुम्हारा शौक है मुझको पता है।। खिलौने और हैं तुम खूब खेलो
भला दिल से भी कोई खेलता है।। वो पत्थर है उसे इतना न चाहो
सभी समझेंगे शायद देवता है।। जिसे तुम सोचते हो सो रहा है
वो चिंतन कर रहा है जागता है।। उसे दो साल का बच्चा न समझो
वो अब अच्छा बुरा पहचानता है।।
मुझे कुछ और जी लेने तो देते।
निगाहें भर के पी लेने तो देते।। कभी कुछ भी नहीं उनसे मिला है
इज़ाज़त ही सही लेने तो देते।। मेरी मैयत में कितने लोग आये
जरा सी हाज़िरी लेने तो देते।। वो मेरी जान लेना चाहता था
जरा सी चीज थी लेने तो देते।। तुम्हारे दर्द लेकर और जीता
मुझे इतनी ख़ुशी लेने तो देते।। तेरे कदमों में जन्नत थी हमारी
तुम उसकी खाक ही लेने तो देते।।
सभी सही रहे मैं ही गलत रहा शायद।
तभी तो हर सजा मैं ही भुगत रहा शायद।।
उन्हें पता था कि मैं बेगुनाह हूँ फिर भी
न बोलने की वजह मौनव्रत रहा शायद।।
मत कहो! पगला गया है।
वो अपनों से छला गया है।।
क्यों करते हो उसकी बातें
जो महफ़िल से चला गया है।।
आम आदमी की बातो से
राजा क्यों तिलमिला गया है।।
वो क्या जाने दुनियादारी
उसे कोई बरगला गया है ।।
तू है अकबर मैं क्या जानूँ
कहाँ तक सिलसिला गया है।।
खुशफहमी थी जिसकोलेकर
वो ही मुझको रुला गया है।।
जिसको चारागर समझा था
जहर वही तो पिला गया है।।
जिससे घर को उम्मीदें थीं
बुनियादेँ तक हिला गया है।।
लो जिंदगी का और एक साल कम हुआ।
कैसे कहूँ कि मुझपे सितम या करम हुआ।।
दुनिया में जितने लोग हुए सब नहीं रहे
उन सब को अपने रहने का कितना भरम हुआ।।
आया गया का खेल कोई खेलता है और
ना जाने कब वो कहदे तमाशा ख़तम हुआ।।
हर सुबह जन्मता हूँ मैं हर शाम मृत्यु है
कैसे कहूँ कि आज हमारा ‪#‎जनम‬ हुआ।।
अधूरी जिंदगी की ख्वाहिशे हैं।
हर एक सूं गर्दिशे ही गर्दिशें हैं।।
यहाँ मिटटी का एक मेरा ही घर है
मेरे घर के ही ऊपर बारिशें हैं।।
मेरा हासिल न देखो मुख़्तसर है
ये देखो क्या हमारी कोशिशें हैं।।
इसे कह लो मेरी दीवानगी है
हम अपने कातिलों में जा बसे हैं।
मेरी मंजिल मगर आसां नहीं हैं
यहाँ तो हर कदम पर साजिशें हैं।।
मुहब्बत से बड़ा मजहब नहीं है
तो क्यों दुनियां में इतनी रंजिशें हैं।।
माँ तुझ पर क्या लिख सकता हूँ।
मैं तो खुद तेरी रचना हूँ।।
तूने खुद को घटा दिया है
तब जाकर मैं बड़ा हुआ हूँ।।
आज थाम लो मेरी ऊँगली
माँ मैं सचमुच भटक गया हूँ।।
मुझसे गलती कभी न होगी
आखिर तेरा ही जाया हूँ।।
तेरी सेवा कर न सका मैं
यही सोच रोया करता हूँ।।
कैसे कर्ज चुकाऊँ तेरे
क्या मैं कर्ज चुका सकता हूँ।।
तेरी दुआ बचा लेती है
जब मैं मुश्किल में होता हूँ।।
मसअलायूँतोकोईखासनथा।
हाँकभीइसकदरउदासनथा।।
उसकाहोनानहोनाहीहोता
वोतोपहलेभीमेरेपासनथा।।
तुम्हेंआराममेंजीनेकीलतहै।
मुझेआरामसेजीनेकीलतहै।।
मेरीकीमतरूपयेमेंआंकतेहो
तुम्हाराआंकलनकितनागलतहै।।
परायेदर्दकोअपनासमझना
यहीसबसेबड़ीइंसानियतहै।।
अगरमाँबापजिन्दाहैंतोसमझो
घटाओंमेंतुम्हारेसरपेछतहै।।
मुझेलगतानहींफ़ानीहैदुनिया
कियेआदमसेअबतकअनवरतहै।।...
तुमक्याजानोकोईकुनबाकैसेबनताहै।
तुमकोक्यालगताहैकोईखेलतमाशाहै।।
कहनेकोतोजीभचलाओकुछभीबकडालो
भानमतीके