तुम क्या जानो कोई कुनबा कैसे बनता है।
तुम को क्या लगता है कोई खेल तमाशा है।।
कहने को तो जीभ चलाओ कुछ भी बक डालो
भानमती के दिल से पूछो क्या क्या होता है।।
जिसको तुम बेदर्दी से स्वाहा कर देते हो
उतना घर बनने में एक ज़माना लगता है।।
ये बहरी सरकारें कब जनता की सुनती हैं
गांव गली से संसद तक चिल्लाना पड़ता है।।
संसद में जब प्रश्न उछलकर चुप हो जाते है
तब सड़कों पर आने पर ही उत्तर मिलता है।।

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