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Showing posts from March, 2010

शरद, शक्कर और सट्टा

देश में चीनी के दाम एकाएक पचास रुपये तक जा पहुँचे।
चीनी के बारे में कृषिमन्त्री के बयानो ने जताया कि चीनी
की अगले तीन साल तक कमी बनी रहेगी।देश की सौ
करोड़ जनता प्रति माह एक किलो के औसत से चीनी का
उपभोग करती है। इस हिसाब से यदि तीस रु. तक दाम
बढे़ तो हर महीने लगभग तीन हज़ार करोड़ रु. का हेर-फ़ेर
हुआ है। यानि एक वर्ष के बफ़र स्टाक पर खेला गया खेल
लगभग तीस हज़ार करोड़ का घोटाला हो सकता है।आज
मन्त्री जी किसानों के दर्द को समझने की बात कह रहे हैं ।
मगर ये वो किसान हैं कारपोरेट हैं। कांग्रेस की मजबूरी हो
सकती है,मगर मुलायम और अन्य विपक्ष क्यों मौन रहा ये
समझ में नही आता।माना कि शरद पवार अर्थशास्त्री नहीं हैं
किन्तु उस खेल के मसीहा हैं जो सट्टे बाजी का पर्याय बन
चुकी है।

शरद पवार को जबाब देना होगा

नयी सरकार गठन के पूर्व ही आम जनता के मन में
इस बात को लेकर संशय बरक़रार था कि कहीं शरद
पवार पुनः कृषि मंत्री न बन जाय और महँगाई
पुनः आसमान छूने लगे लेकिन आशंकायें सही
साबित हुयीं और खाद्य पदार्थो कीbetahaasha
मूल्य -वृद्धि ने आम जन को झकझोर कर रख दिया
है गेहूं व दालें(arhar) ,khady तेल आदि के दाम
गरीब की थाली पर साहूकार बन कर बैठ गए
चीनी के दाम ,मराठा सूगर -लाबी और शरद
पवार के सम्बन्ध जग जाहिर है क्रिकेट का
सट्टा कृषि उत्पादों पर हावी हो गया प्रति
व्यक्ति एक किलो चीनी के औसत से तीस रुपये
की मूल्य वृद्धि से देश की गरीब जनता पर हर
माह तीन हज़ार करोड़ का बोझ बढ़ा इस तरह
छः माह में ही अट्ठारह करोड़ रुपये का घोटाला
या हेर-फेर हुआ है जो की सरकार और विपक्ष
के पूर्णतः संज्ञान में है पवार साहब भले ही सफाई
दे ,मगर जनता सब समझ रही है देश के जिन
किसानों का समझ ने की बात पवार साहब करते
है वे गरीब नहीं कारपोरेट किसान है फिर जब
देश में कई अर्थ व्यवस्थाये एक साथ चल रही हो
तब उनका तर्क और भी गले नहीं उतरता माननीय
कृषि मंत्री का सौभाग्य है की देश के मंत्री का चुनाव
लोक सभा क्षेत्रो तक सीमित है लेकिन एक समय ऐ…

एक कबीर का जाना :कृष्णानंद चौबे

बेकार का ये, शोर शराबा है शहर में
समन्दर के भी जाने का पता तक नहीं चलता
हम कई बार उन बातों पर बहुत ज्यादा चर्चा करते हैं,जो अर्थहीन
सी होती हैं। हम उन नेताओं की कही बातों पर प्रतिक्रियाशील हो
उठते है जो सही मायनों में सन्दर्भहीन हैं।भाषा,क्षेत्र, जाति,सम्प्रदाय
की राजनीति करने वालों के जीने मरने पर सक्रिय हो जाना एक
फ़ैशन हो गया है। ऐसे में कृष्णानन्द जी का जाना क्या चर्चा का
विषय बन सकता था। लेकिन साहित्य जगत में एक खालीपन तो
शिद्दत से महसूस किया गया। पत्रकार भाईयों ने अपने दायित्व का
निर्वहन किया।किसी शायर ने कहा है--
गये ज़माने के सिक्के लिये मैं बैठा हूँ,
किसी फ़कीर का आना इधर नहीं होता॥
कृष्णानन्द जी सम्भवतः इसी स्थिति में आ चुके थे। लेकिन
उनकी रचनायें , उनके शेर आज भी प्रासन्गिक हैं। सच पूछिये
तो चौबे जी आधुनिक कबीर थे,मन्सूर थे। उनकी एक ही पंक्ति
उनके जीवन-दर्शन का बोध कराने के लिये पर्याप्त है--
मंदिरों में आप मनचाहे भजन गाया करें।
मयकदा है ये, यहाँ तहजीब से आया करें॥