Posts

Showing posts from May, 2015

चिंतन ! चिंतन!! चिंतन!!!

इस चिंतन  अभिनन्दन।
कको
ल कुछ तो हलचल होगी
या ऐसी ही कल होगी
या फिर सुधरेगा जीवन।
कुछ तो अधिकार मिलेंगे
इस आशा को अभिनंदन ।।या फिर अधिकारी होंगे
अपना होगा सिंघासन ।
हाँ !अपना होगा शासन।।
हमने जो सपने देखे
अब भी तो देख रहे हैं
कुछ होगा ऐसा जीवन।
कब होगा वैसा जीवन।।
इस आज़ादी का क्या है
पर सावधान रहना है
आखिर है अपना ही धन
इसकी रज भी है चन्दन।।
इस आज़ादी के शुभ दिन
आनंदित है जन गण मन
जन गण मन का आराधन
इस जन गण को अभिनंदन ।।

कैसे लिख लेते हैं

लोग कैसे लिख लेते हैं
रोज एक नयी कविता?
क्या वे कमाने नहीं जाते?
कामगार
किसान
मजदूर
ये लिख सकते हैं?
नहीं!पर मैं इनके किये कार्यों में
कविता देखता हूँ
पढता हूँ
समझता हूँ!!!!!

देकर ज़ख्म दवा करता है।

देकर ज़ख्म दवा करता है।
यूँ एहसान किया करता है।।
मैं जब दीपक बन जलता हूँ
वो तूफान हुआ करता है ।।
पंछी कब स्कूल गये है
उड़ना वक्त सिखा देता है।।
घर में दुनिया बहुत बड़ी थी
बाहर का दिल भी छोटा है।।
अम्मा बस तुम साथ नहीं हो
बच्चा तो अब भी रोता है।।
माँ तुम हो तो सब अपना है
वरना इस दुनिया में क्या है।।
आज गंग-जमुनी भारत भी
हरा , लाल,पीला ,भगवा है।।
क्या क्या रंग बदल लेती है
अजब सियासत की दुनिया है।।

गहरी बात कही है शायद!

उनसे कुछ मौजू -ए-पहल मिल जाय।
गो कि दुश्वारियों के हल मिल जाएँ।।
तुम मुझे इस तरह से मिल जाओ
जैसे शायर को इक गजल मिल जाय।।
मेरे हरजाई मैं भी चाहूँगा
तुझको एकदिन मेरा बदल मिल जाय।। गहरी बात कही है शायद!
तेरी बात सही है शायद।।
क्या होती है दुनियादारी
मुझमे समझ नही है शायद।।
तुम मुझको भी समझ न पाये
मेरी कमी रही है शायद।।
जो मुझसे ही दूर हो गया
मुझमे आज वही है शायद।।
उसकी यादें उसकी बातें
करते नींद बही है शायद।।


के भीख में तो कोई जिंदगी नही देता ।।

जो मुझसे ले गया वो चीज भी नहीं देता।
मुझे तलाश के कोई ख़ुशी नहीं देता ।।

मांगिये मौत तो शायद कोई तरस खा ले
के भीख में तो कोई जिंदगी नही देता ।।

ये बात कैसे कहें वो करीम है यारों
अगर वो चाहता कोई कमी नही देता।।अदीब

पूजा पाठ की बात दूसर है।

देवी को पूजा 
उनकी मूर्ति के पैर छुए
कन्या पूजीं
सब कन्याओं के पाँव धुले
चमारिन की बिटिया को छोड़कर।
और गुप्ताइन को ?
नहीं बुलाया
उसके घर कोई आता है
सुना है धन्धा?
राम राम!!!!!!
मालूम है
देवी की मूर्ति में
वेश्या के घर की धूल
मिलायी जाती है।
तुम भी कैसी बात करती हो?
पूजा पाठ की बात दूसर है।

उई रहे अंगूठाटेक और शिक्षा केर मिनिस्टर हुई गये।।

तुम लिए रहौ नोबुल ।दिनामान चाटा करौ।
उई फैलाईन आतंक और जननेता हुई गये।।
तुम खूब पढ़े और बी एड करिके टीचर कहिलाये,
उई रहे अंगूठाटेक और शिक्षा केर मिनिस्टर हुई गये।।

जो अच्छे थे जमाने जा चुके हैं।।

शहर में आईने सस्ते हुए हैं।
न जाने लोग क्यूँ सहमे हुए हैं।।

मुझे कुफे की बैय्यत देने वालों
मुझे बख्शो बहुत धोखेे हुए हैं।।

दिखाओ ख्वाब मत अच्छे दिनों के
जो अच्छे थे जमाने जा चुके हैं।।

समझे अच्छे दिन का मतलब

मत भूलो झूठों के दिन हैं।
लफ्फाजों लुच्चों के दिन हैं।।
गाल बजाकर राज करेंगे
ये चारण भाटों के दिन हैं।।
समझे अच्छे दिन का मतलब
ये दौलत वालों के दिन हैं।।
अब है सब बाज़ार नियंत्रित
सेठों दल्लालों के दिन हैं।।
हैं 'अदीब ,बेकार परेशां
ये तो बेअदबों के दिन हैं।।

बहावी‬ आतंकवाद पर)

मैं हिन्दू होने पर
गर्व नहीं कर पाता हूँ
क्योंकि
हिन्दू बताते ही
जाति भी पूछी जाती है।
जाति से
तय हो जाती है योग्यता
और तय हो जाता है
मेरा चौथा या पांचवा दर्जा।
फिर भी मैं
हिन्दू रहना चाहता हूँ।
क्योंकि
यहां जीने की ‪#‎आज़ादी‬ तो है।(‪#‎बहावी‬ आतंकवाद पर)

कलेजा क्यों तेरा काँपा नहीं था।।

फरेब ओ छल से बावस्ता नहीं था।
कोई भी उनमे शाइस्ता नहीं था।।
मुजाहिद थे वो गोया कर्बला के
किसी ने भागना सीखा नहीं था।।
न था नफरत का उनको इल्म कोई
उन्हें बदले का अंदेशा नहीं था।।
सभी असगर सभी लख्ते जिगर थे
कोई इबलीस का शोहदा नहीं था।
सभी थे अम्न इमां के पयम्बर
कोई सल्फी ओ फजलुल्ला नहीं था।।
खुदाई नेमतों को मारने में
कलेजा क्यों तेरा काँपा नहीं था।।

अब तक कितने क़त्ल हुए हैं

अब तक कितने क़त्ल हुए हैं
अब तक कितने घर उजड़े हैं।
क्या लेना इन सब से हमको
दुःख के अवसर बहुत पड़े हैं ।
अब इतने सरमायेदारों के
हम पर एहसान बड़े हैं।।
खुश है हम बहुमत में आकर
देखें कितने वोट मिले हैं।।
मेरे सपने कितने सारे
झिलमिल झिलमिल जैसे तारे
पलकों पर तिरते रहते हैं।
अम्बानी के वारे न्यारे-
करते उन सपनों से प्यारे
मोदी जी खेला करते हैं

का इतिहास पढ़ावल जाता।

का इतिहास पढ़ावल जाता।
बातन से भरमावल जाता।।
देश के करतिन जे कुछ कईलस
तेकर नाम सभे भुलववलस
जे जे रहल खिलाफ देश के
तेकर मान बढ़ावल जाता।।का...
जेही बैठी तेही खाई
देख!नेतन के अधिकाई
देश बेच कर के जनता के
देशराग सुनवावल जाता।।का.....

नंगेपन को नमस्कार है।।

ये भी कोई चमत्कार है।
नंगेपन को नमस्कार है।।
चमचम चमचम झिलमिल झलिमिल
सारी दुनिया जैसे ग़ाफ़िल
भूली अपने संस्कार है।।
कोई शर्म न कोई लाज है
ख़त्म हुए सारे लिहाज़ है
मर्यादाएं तार तार हैं।।नंगेपन.....

कांग्रेस की तरह किसलिए शैय्या पर लेटे हो

कांग्रेस की तरह किसलिए शैय्या पर लेटे हो
 उठो अन्ततः भारत माँ के तुम भी तो बेटे हो
उठकर युद्ध करो हे अर्जुन क्या पाबन्दी है।
तुमने जिसे शेर समझा ये वही शिखंडी है।।
गांव गली में घूम घूम कर जन जन से मिलकर
खोजो जनता के प्रश्नों के जनता में उत्तर
यही राजपथ पहुंचाने वाली पगडन्डी है।।
यह जनपथ से संसद तक पहुंचा भी सकती है
निरअंकुश को मिटटी में मिलवा भी सकती है
बनी पगलिया घूम रही ये ही रणचंडी है।।
राम नाम पर मार रहा भक्तों की डंडी है।
जिससे तुम भयभीत हो रहे हो पाखंडी है।।

हम जुमलों के बादशाह हैं।

कितने जुमले याद करोगे
हम जुमलों के बादशाह हैं।
कितनी बाते याद रखे हम
हम भूलों के बादशाह हैं।।
कहने से क्या घट जाता हैं
अपना कद कुछ बढ़ जाता है
प्यार जंग में जो है जायज
उन हमलों के बादशाह हैं।।
जीत गए हम खुशनसीब हैं
वरना जनता बदनसीब है
अब जनता रोये या गाये
हम शूलों के बादशाह हैं।।

अब तो सड़कें ही बचेंगी हल के लिए।

अब तो सड़कें ही बचेंगी हल के लिए।
खेत तो बचेंगे ही नहीं फसल के लिए।
हवा न अन्न न पानी रहेगा कल के लिए।
कुछ तो हम छोड़ते आने वाली नसल के लिए।।


सँवर के रात मेरी चांदनी सी हो जाये।
यूँ छुओ कि छुवन सनसनी सी हो जाये।।
कि ताल ताल मेरी धडकनों में गूंज उठे
कि श्वांस श्वांस मधुर रागिनी सी हो जाये।।

न समझो कि हम बेअसर हो गए हैं।

कभी छिपकली थे मगर हो गए है।
विधायक के हम नाइबर हो गए हैं।।
कातिलों के मुहल्ले में घर क्या लिया
शहर के बड़े नामवर हो गए हैं।
मरने से डरते थे अब ये है आलम
पुलिस हिस्टरी में अमर हो गए हैं।
कवि सम्मेलनों में हैं चर्चे हमारे
बहुत महंगे हम नगमागर हो गए हैं।
इधर थे अभी अब उधर हो गए हैं
न समझो कि हम बेअसर हो गए हैं।

सख्त मना है

सत्ता से पहले विनम्र थे
आज उन्हें इतना घमंड है।
आज सब्सिडी छीन रहे है
जाने कैसा मापदंड है।।
कल कह देंगे सख्त मना है
खुली हवा में सांसे लेना
घर से बाहर कहीं निकलना
दुःख तकलीफ में रोना धोना
आज़ादी का अनुभव करना
उल्लंघन पर कड़ा दंड है।।

दोस्तों को आज़माना चाहिए।।

आज वो मुझसे मिले या आज वो आये नहीं
मुझको पीने के लिए कुछ तो बहाना चाहिए।।
वो पिलाएगा मुझे या साफ कर देगा मना
देखते हैं दोस्तों को आज़माना चाहिए।।

अपने अपने हिस्से की खुशियाँ तलाशते हैं।

अपने अपने हिस्से की खुशियाँ तलाशते हैं।
एक दूसरे का दुःख हम अब कहाँ बांटते हैं।।

मौका पड़ते ही हिन्दू -मुस्लिम हो जाते हैं
दीन-धरम का मूल मन्त्र हम कहाँ जानते हैं।।

विश्व बंधुता ,राष्ट्रप्रेम का ढोंग रचाये लोग
सत्कार बाद में सबसे पहले जाति पूछते हैं।।

चलो फिर एक कोशिश करके देखें।

चलो फिर एक कोशिश करके देखें।
कि तुझसे संगदिल पे मरके देखें।।

झलक भर मिल न पाये फायदा क्या
तमन्ना है तुझे जी भर के देखें।।

सुना है हर अदा उनकी है कातिल
चलो उनकी अदा पे मर के देखें।।

जिसे हम चाहते हैं क्या गजब है
उसे देखें भी तो डर डर के देखें।।

हमें तूफान का डर मत दिखाओ
कहो तो हम उड़ानें भर के देखें।।

मेरा शौके-चरागाँ इक जुनूँ है
हवाएँ अपनी कोशिश कर के देखें।।

तस्कर हो !

तस्कर हो !
जंगल से लकड़ी काट रहे हो।
नक्सलवादी हो!
हमें घूर कर ताक रहे हो।।
आतंकी हो !
हमसे डर कर भाग रहे हो।।।
जल,जंगल,जमीन 
सभी कुछ सरकारी है
आदिवासियों!!!
इन सब का उपभोग
देश से गद्दारी है।।

नूरा -कुश्ती है चलो देखें सही।

नूरा -कुश्ती है चलो देखें सही।
बानगी ही है चलो देखें सही।।

आज फिर उस भ्रमर के आगोश में
नई तितली है चलो देखें सही।।

जाने कब भारत महाभारत बने
कौन शकुनी है चलो देखें सही।।

मूल कारण युद्ध का है द्रौपदी
या कि तुलसी है चलो देखें सही।।

सबके हाथों में है खंजर ठीक है
पीठ किसकी है चलो देखें सही।।

पूजी जाती हैं यहाँ पर नारियाँ
फिर क्यों सहमी हैं चलो देखें सही।।

जाने कितनी नजरों के पर्दे में रहकर ।

जाने कितनी नजरों के पर्दे में रहकर ।
नारी क्या रह पाती है सचमुच पर्दावर।।
चाहे जितने कपड़ों के वह कवच चढ़ा ले
चुभते रहते हैं वहशी नज़रों के नश्तर।।
किन किन रिश्तों में नारी महफूज रही है
कहने को तो पर नारी है बहन बराबर।।
रिश्ते के भाई,चाचा बाबा या जीजा
कोई पडोसी फूफा मामा जेठ औ देवर।।
सब के सब ही अपनी जात दिखा देते हैं
एक जानवर छुपा हुआ है सबके भीतर।।

सफर सफर गुजर रहे है हम।

सफर सफर गुजर रहे है हम।
दर नहीं दर-ब-दर रहे हैं हम।।

कोई नजरें मिला के कह देता
उसके दिल में उतर रहे हैं हम।।

उनकी तारीफ़ दूसरा न करे
इतने फितना जिगर रहे हैं हम।।

उसकी नजरों में कोई जादू है
कतरा कतरा संवर रहे हैं हम।।

सिर्फ अपने लिए ही क्या जीना
कोई एहसान कर रहे हैं हम।।

इतनी वहशत हमारी आँखों में
क्या कभी जानवर रहे हैं हम।।

जब बस्ती में आग लगेगी

जब बस्ती में आग लगेगी
हमीं बुझाएंगे।
उससे पहले आग लगाने
भी हम आएंगे ।।
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई
आपस में भाई
इनको पहले लड़वाएंगे
फिर मिलवायेंगे।।
जाति धर्म भाषा मजहब से
भूख नहीं मिटती
हम इनके द्वारा ही अपनी
भूख मिटायेंगे।।
राजनीति को धर्म समझना
बड़ी मूर्खता है
किन्तु धर्म की राजनीति को
हम अपनाएंगे।।
शेमलेस होकर ही हम
संसद में पहुंचेंगे
फिर संसद में शेम शेम
हम ही चिल्लायेंगे।।
सुनते है पिछले डिब्बे में
झटके लगते हैं
हम गाड़ी में पिछला डिब्बा
नहीं लगाएंगे।।