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Showing posts from January, 2024
 अब वो अपने सनम नहीं फिर भी। बेवफ़ाई  का ग़म  नहीं  फिर भी।। तेरा कूचा अदम नहीं फिर भी। जान देने को कम नहीं फिर भी।। आशिक़ी में नहीं मिले तगमे ज़ख़्म सीने पे कम नहीं फिर भी।। जब मिलोगे गले लगा लोगे मुझको ऐसा वहम नहीं फिर भी।। कैसे कह दें कि अब सिवा तेरे और होंगे सनम नहीं फिर भी।। यूज़ एंड थ्रो का अब ज़माना है ऐसा कोई भरम नहीं फिर भी।। जाने क्यों साहनी को पढ़ते हैं उसकी ग़ज़लों में दम नहीं फिर भी।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 चलो माना मुझे कम जान पाये। कभी अपना न मुझको मान पाये।। मुझे तो आईना दिखला रहे थे कभी ख़ुद को भी क्या पहचान पाये।।साहनी
 जिसको सुनने की साध रही जिसकी लालसा अगाध रही वह बात नहीं तुम कह पाये  वह बात कहाँ हम सुन पाये।। ऐ काश कभी हम चल पाते उस पथ पर जिस पर चल न सके मिलने की चाह लिए बिछुड़े ऐसे बिछुड़े फिर मिल न सके तुमने थामी विपरीत डगर हम भी भटके दूजे पथ पर किंचित इसकी थी यही नियति कब कुसुम टूट कर खिल पाये दो कदम चले हम तुम साथ पर जग को साथ नहीं भाया जाने क्यों अपनों को अपना हाथों में हाथ नहीं भाया
 कवि Suresh Sahani  जी की कलम से बेहद खूबसूरत, उत्कृष्ट, अतुलनीय, अनुपम सृजन  .... रामायण भी पढ़ते हो। भाई से भी लड़ते हो।। सदा भरत को गुनकर भी पद के लिए झगड़ते हो।। ब्रम्ह सत्य समझाते हो धन के पीछे पड़ते हो।। ठाठ धरे रह जाने हैं किस के लिए अकड़ते हो।। कभी स्वयं को ताड़े हो बस औरों को तड़ते हो।। दीनों हीनों दुखियों का क्या तुम हाथ पकड़ते हो।। इसी धरा पर आओगे सुत सुरेश सम उड़ते हो।। सुरेश साहनी, कानपुर
 जाने क्यों गुनगुनाते हुए रो दिए। आज हम मुस्कुराते हुए रो दिए।। गुल की साज़िश है या खार की दिल्लगी हँस के दामन छुड़ाते हुए रो दिए।। वो थे वादफ़रामोश हँसते रहे हम थे वादा निभाते हुए रो दिए।। उनकी तस्वीर दिल से हटानी पड़ी ज़ख़्म दिल के सजाते हुए रो दिए।।
 बस यही बात भूल जाता हूँ। आज भी जात भूल जाता हूँ।। रात को तू तो याद रहता है हर सुबह रात भूल जाता है।। यूँ तो सारे जवाब हाज़िर हैं बस सवालात भूल जाता हूँ।। जीत कर मुझ से तू अगर खुश है मैं मिली मात भूल जाता हूँ।। तेरे ग़म भी बड़ी इनायत हैं क्यों ये खैरात भूल जाता हूँ।। माफ़ करना सुरेश उल्फत में फ़र्ज़-ओ- ख़िदमात भूल जाता हूँ।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 बड़ी कोई बुराई आ गयी है। निगाहों में अच्छाई आ गयी है।। मसीहा वक़्त के हैं आज सहमे  जो मुझमे पारसाई आ गयी है।।
 हुस्न के रंग क्या खिले हम पर। कितने इल्ज़ाम लग गये हम पर।। इक ज़रा आपकी क़सम क्या ली आप तो सच मे मर मिटे हम पर।।साहनी
 छोड़कर राहों में अक्सर कारवाँ जाते रहे। करके सूरज के हवाले सायबाँ  जाते रहे।। हो गये फौलाद हम अपने इरादों की तईं लोग जो समझे थे हमको नातवां जाते रहे।। बदगुमां थे कद को लेकर जाने कितने सरबुलन्द पर ज़मीने-दोगज़ी में आसमाँ जाते रहे।। बरकतें सब जाने किसकी बदनिगाही खा गई अब नहीं आते हैं सारे मेहमां जाते रहे।। सायबान- छाया देने वाले कारवां- काफिला नातवां- कमज़ोर बदगुमां- भ्रमित सरबुलन्द- ऊँचे लोग ज़मीने-दोगज़ी -  कब्र बदनिगाही - बुरी निगाह सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 एगो भोजपुरी ग़ज़ल... फेर जनउरी छब्बिस वइसन आयी का? निम्मन दिन के आशा फेर धराई का।। रमरतिया के बेटी नींद में चिहुंकल बा गांव में फेनियो नेता कवनो आयी का? गाँव मे केहु काहें रुपया बांटत बा अबकी खेती भी रेहन रखवाई का।। का अब केहु गाँव मे महुआ बीनेला अब्बो गांव में महकेले अमराई का? ए बाबू उ जून जमाना बीत गइल अब अपने घर बाटे उ अंगनाई का? अब होली में रंग कहाँ से आई हो पटिदारी में का देवर भउजाई का? जवन लजात रहे उ रधिया कहाँ गइल केहू ओकरे जइसन आज लजाई का? ढेर बरिस पर गांवें में लउकल बानी ए सुरेश जी रउरो खेत बिकाई का? सुरेश साहनी कानपुर #भोजपुरी
 सिर्फ़ लाइक कर के चल देते हो तुम। कब किसी रचना को बल देते हो तुम।। वाह लिखने में भी हो कंजूस प्रिय क्यों नहीं मेहनत का फल देते हो तुम।।
 हाँ लेकिन कुछ अजब नहीं है। भूख से मरना गजब नही है।। अरब में भी तो  मरते होंगे और बात ये अरब नहीं है।। (किसी गरीब की भूख से मौत पर)
 नींद गायब सुकून गायब है। जिस्मे-फ़ानी से खून गायब है।। किस की ख़ातिर जियें मरें किसपर सब तो अपनी रवानियों में हैं। और सच पूछिये  वफ़ादारी सिर्फ किस्से-कहानियो में हैं  फिर जो रह रह उबाल खाती थी अब वो जोशो जूनून गायब है।। कोई उम्मीद हो तवक्को हो कोई मन्ज़िल,  तलाश हो कोई जिंदगी जीने की वजह तो हो कुछ बहाना हो आस हो कोई साथ जब तुम  नही तो लगता है हासिले-कारकून गायब है।। सुरेशसाहनी, कानपुर
 सर पे जब अपने सायबान न था। लोग थे कोई हमज़बान न था।। आशना था मेरा शहर मुझसे पर शहर में मेरा मकान न था।। फेल होने का डर न था हरगिज़ इश्क़ था कोई इम्तेहान न था।। क्या ख़ुदा है ज़मीं की पैदाइश उससे पहले ये आसमान न था।। दूर होने की थी वज़ह इतनी फासला अपने दरम्यान न था।। शेख़ क्यों मैक़दे से लौट गया दीन वालों को इत्मिनान न था।। इतने ख़ाने बना दिये नाहक़ वो ख़ुदा भी तो लामकान न था।। सुरेश साहनी,अदीब कानपुर
 क्या भूल गये हो कि मुझे याद करे हो। मैं ही हूँ अज़ल से जिसे बरबाद करे हो।। जैसे हो सताने में कहाँ चूक करे हो हर रोज़  तरीका  नया ईजाद करे हो।। माहिर हो तग़ाफ़ुल में कोई जोड़ नही है बस इतना बता दो किसे उस्ताद किये हो।। किस किस पे चलाये हो सनम नैन के जादू कितनों को कहो प्यार में मुनकाद करे हो।। इस दिल पे सितम लाख करे जाओ हो लेकिन जब अपने पे आ जाय तो फरियाद करे हो।। अज़ल/सृष्टि का आरंभ, आदि, शुरुआत से ईजाद/ खोजना, अविष्कार माहिर/कुशल तग़ाफ़ुल/ उपेक्षा, ध्यान न देना मुनकाद/ वशीभूत, सम्मोहित सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ज़िन्दगी का कारवाँ लुटता रहा। धीरे धीरे सब ज़हाँ लुटता रहा।। इस तरफ आबे-रवां लुटता रहा। उस तरफ कोहे-गिरां लुटता रहा।। गुल खिलें सब बुलबुलें गाती रहीं और मेरा आशियाँ लुटता रहा।। उनके हिस्से की ज़मीं बढ़ती गयी और अपना आसमां लुटता रहा।। लामकां सब चैन से सोते रहे इक मेरे मन का मकां लुटता रहा।। सब तमाशा देख कर खामोश थे मैं था गोया रायगां लुटता रहा।। चीखने पर कौन सुनता साहनी मैं भी बनकर बेजुबां लुटता रहा।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 फिर बेताल लदेगा मुझ पर यही सोच कर मैं हर उसको  मित्र बनाने से बचता हूँ। जो लेखन में समझ रहा है बड़ा किसी माने में ख़ुद को गोया उससे बड़ा आज तक कहीं कोई भी नहीं हुआ है मुखपोथी पर इस प्रजाति के जाने कितने कोटि लोग हैं जो औरों की नहीं पढ़ेंगे बस अपनी चेपे जाएंगे  ......
 किरदार तो मुझ  जैसे थे और ज़माने में। पर उनकी थी दिलचस्पी इक मुझको सताने में।। क्या खूब बहाना है सिजरे की तवीलाई कोताह सही कुछ तो तुम कहते फ़साने में ।। मैं याद न आया हूँ ऐसा तो नहीं होगा झिझके तो ज़रूर होंगे तुम मुझको भुलाने में।। गुलशन में हर इक गुल पर मँडराया किये भँवरे बदनाम रहे कांटें गुलशन को बचाने में।। सुरेश साहनी कानपुर
 जब आप भी थे करीब मेरे। तो बन गये क्यों रक़ीब मेरे।। अदूँ के जैसे जो दिख रहे थे ये सब थे शायद हबीब मेरे।। कि दौरे-गर्दिश में गुम हुए क्यों जो बन रहे थे नसीब मेरे।। रहेगा क़ायम  ये ज़र्फ़ बेशक़ लदा है कांधे सलीब मेरे ।। रहेगी गुरबत से जंग जब तक है साथ इतने गरीब मेरे।। सुरेश साहनी कानपुर 945154532
 दूसरों के वास्ते आख़िर कहाँ तक जान दें। अब ज़रूरी है कि कुछ अपने भी ऊपर ध्यान दें।।  जो हमें आदर न दे परवाह उसकी व्यर्थ है जो न दे सम्मान उसको किसलिए  सम्मान दें।। इनकी उनकी सबकी ज़िंदाबाद में हम खो गए बेहतर होगा कि हम ख़ुद को कोई पहचान दें।। अब तो गिव एंड टेक का ही है चलन चारो तरफ मान उनको चाहिए तो वो हमें भी मान दें।।   सुरेश साहनी कानपुर
 सिर्फ़ उससे राब्ता इतना रहा। वो किसी का और मैं उसका रहा।। वो मुसलसल भीड़ में रहता रहा। हैफ़ उसके बाद भी तनहा रहा।। ज़िंदगानी का सफ़ऱ कैसा रहा। कट गई तो मान लो अच्छा रहा।। उम्र सारी साथ तो चलता रहा। उम्र भर वो अज़नबी जैसा रहा।।
 कुछ मुक़म्मल कुछ अधूरी ज़िन्दगी। कट रही है यूँ ही पूरी ज़िंदगी।। जी चुके तो और जीने की हवस जबकि है श्रद्धा सबूरी ज़िन्दगी।। किसलिए आयी गयी में कट गयी थी अगर इतनी ज़रूरी ज़िन्दगी।। हम उमस वाले हैं कोई  उपनगर आपकी ऊटी मसूरी ज़िन्दगी।। मौत ठण्डी छाँव जैसे नीम की और है साया खजूरी ज़िन्दगी।। ओढ़ लेंगे मर के तहज़ीबे-कफ़न मत सिखा नाहक़ शऊरी ज़िन्दगी।। तेरे बिन जीना क़यामत है सुरेश किस तरह है तुझ से दूरी ज़िन्दगी।। सुरेश साहनी, अदीब कानपुर 9451545132
 सिर्फ़ दैरोहरम से निस्बत है। या हमारे भी ग़म से निस्बत है।। क्या तुम्हें सच में हम से निस्बत है। जब तुम्हें हर वहम से निस्बत है।। सिर तो झुकता है मयकशों का भी पर सुराही के ख़म से निस्बत है।। साथ करता है क्यों यज़ीदों का जब हुसैनी अलम से निस्बत है।। कैसे माने  उसे फकीरों में क्या उसे कम से कम से निस्बत है।। ज़ेर भी तो  हैं मर्जियाँ रब की  क्यों तुझे सिर्फ़ बम से निस्बत है।। साहनी खुश है मयकदे आकर शेख़ को ही अदम से निस्बत है।। सुरेश साहनी , कानपुर 9451545132
 आओ अपने ही नक्शे पा पे चले कम से कम राह तो न भटकेंगे।।SS मेरी अच्छाइयों का ज़िक्र तौबा!!! कमी क्या क्या हैं मुझमे सोचता हूँ.।। क्यों नहीं आप हमें भूल ही जाने देते। जब नहीआप हमें साथ मे आने देते।।
 गरीबी में दामन बचाये हुए है। ज़माने से ख़ुद को छिपाये हुए है।। उसे क्या पता तिश्नगी के मआनी जो होठों के सागर बचाये हुए है।। कहो शेख़ से मैक़दे आ के देखे ख़ुदा उस से क्या क्या छुपाए हुए है।।
 हमने सोचा कि ये काम करते चलें। हर खुशी आपके नाम करते चलें। ज़िन्दगी  आपकी मेरी है चार दिन एक दूजे से जय राम करते चले।। कुछ यूँही सबकी चलती रहे ज़िन्दगी संग हँसती मचलती रहे ज़िन्दगी अपने जयराम आशीष देते रहें सौ बरस और खिलती रहे ज़िन्दगी।। काव्य के पर्याय हैं जयराम जय नवगीत के अध्याय हैं जयराम जय। एक अंचल या शहर की बात क्या देश भर में छाए हैं जयराम जय।। सिर्फ मेरे और तेरे दिल मे नहीं सबके मन को भाये हैं जयराम जय।। शोर उठता है चलो सुनने चलें कार्यक्रम में आये हैं जयराम जय।।
 मस्त रहना हुज़ूर का हक़ है। रौ में बहना हुज़ूर का हक़ है।। जब वो चाहेंगे तब ही बोलेंगे मन की कहना हुज़ूर का हक़ है।। साहनी
 आशिके-जां की ये क़दर न हुई। मर गया मैं तुझे ख़बर न हुई।।
 माना सब तेरे दीवाने बैठे थे। पर मुझको क्यों दुश्मन माने बैठे थे।। आईने लेकर  अफ़साने बैठे थे। किस पत्थर को हाल सुनाने बैठे थे।। यारब उनको प्यार सिखाने बैठे थे। जो आदम का  खून बहाने बैठे थे।। उनकी रक़ाबत भी क्या केवल मुझसे थी आख़िर वे सब किसको पाने बैठे थे।। थे तो इश्क़ के मज़हब वाले हैरत है फिर भी मुझ पर ख़ंजर ताने बैठे थे।। तू जिन जिन की उम्मीदों का क़ातिल था वे सब तुझको ईसा माने बैठे थे।। पूछेंगे मौला से क्यों ख़ामोश रहे या वो भी मुझको निपटाने बैठे थे।। तीरे निगाहे नाज़ से हम महरूम रहे क्या महफ़िल में और निशाने बैठे थे।। दैरोहरम से हार गदाई लौट गए अहले ख़ुदा जाकर मैखाने बैठे थे।। तुम सुरेश सुकरात बनोगे मालूम था क्यों दुनिया को सच समझाने बैठे थे।।
 अपने सरकार पढ़ नहीं पाते। हैं तो सरदार पढ़ नहीं पाते।। हम वो अशआर पढ़ नहीं पाते। सच के अखबार पढ़ नहीं पाते।। अब भी अहले क़लम की खुद्दारी अहले दरबार पढ़ नहीं पाते।। भर ज़हाँ  की किताब पढ़ते हैं इक मेरा प्यार पढ़ नहीं पाते।। अबके मुंसिफ़ गुनाह करते हैं ये गुनहगार पढ़ नहीं पाते।। बातिलों को है डिग्रियाँ हासिल जबकि हक़दार पढ़ नहीं पाते।। आज भी एकलव्य कटते हैं अब भी लाचार पढ़ नहीं पाते।। आईने आदमी नहीं होते आईने प्यार पढ़  नहीं पाते।। साहनी को पढ़ा फकीरों ने सिर्फ़ ज़रदार पढ़ नहीं पाते।। सुरेश साहनी, कानपुर 945154512
 क्या जाने किसकी सेवकाई करता हूँ। रोज उधड़ता हूँ तुरपाई करता हूँ।। रीझा करता हूँ जब तब मैं ख़ुद पर ही प्रभु के आगे नित्य  ढिठाई करता हूँ।।
 ग़म की दौलत से क्या बना लेता। ओढ़ लेता कि मैं बिछा लेता।। सब ने अपना ज़मीर बेच लिया मैं अगर बेचता तो क्या लेता।। दिल की दौलत को लूटने वाले मैं न देता तो खाक़ पा लेता।।
 छोड़कर अपने आशियानों को। आओ छूते हैं आसमानों को।। वक़्त कब आज़मा सका हमको हम बुलाते थे इम्तहानों को।। मेज़बां लापता है महफ़िल से खाक़ देखेंगे मेहमानों को।। अपने तकिए में चल के सोते हैं कितना देखें ख़राब खानों को।। सांस की धौंकनी में ही दम है कम जो समझे हो नातवानों को क्यों मशक्कत करे हैं खेतों में कौन समझाए इन किसानों को।।
 नफ़रत को अब नादानी कह देते हैं। भुने भात को बिरयानी कह देते हैं।। कभी ज़हर को अमृत कहने वाले ही अब अमृत को भी पानी कह देते हैं।। अब जो भी इंसाफ़ के हक़ में लड़ता है वे उसको पाकिस्तानी कह देते हैं।।
 जहाँ धूप ने हमें छांव दी वहीं चांदनी में झुलस गए ।। कभी नैन उन से उलझ गए कभी वो निगाह में बस गये।।
 उफ़ ये ठण्डी धूप के दिन आदमी को क्या सुकूँ दें रात भी दहकी हुई ठिठुरन समेटे जिंदगी जैसे जलाकर राख करना चाहती है जेब इतनी ढेर सारी हैं पुरानी जैकेटों में पर सभी ठंडी गुफायें क्या हम अपने मुल्क में हैं!!!! कौन है यह लोग जो फिर लग्जरी इन गाड़ियों से होटलों में , रेस्तरां में जश्न जैसी हरकतों से रात में भी पागलों से शोर करते फिर रहे हैं।। सुरेशसाहनी