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काफी सोच समझकर लिखिए।

काफी सोच समझकर लिखिए।
जो लिखिए डर डर कर लिखिए।।
सच लिखना इक बीमारी है
बीमारी से बचकर लिखिए।।
बाबा जादू टोना लिखिए
ओझा जन्तर मन्तर  लिखिए।।
माना कि सरकार बुरे हैं
फिर भी हद के अन्दर लिखिए।।
इन सबसे मन भर जाए तो
गइया लिखिए गोबर लिखिये।।

समन्वयवाद(COHERISM)

उपलब्धता ,आवश्यकता और उपभोग के बीच संतुलन ही समन्वय है।समन्वय सहज भौतिक क्रियाओं और वैज्ञानिक प्रतिपादनों को स्वीकार करता है।प्रकृति,विकास और समाज के बीच किसी भी प्रकार का असंतुलन विनाश को जन्म देता है।जो घट चुका है,जो घट रहा है और जो घटेगा इन सब के मध्य समीचीनता ही समन्वय है।जहाँ कार्लमार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद अभिजात्य वर्ग और मेहनतकशों के बीच सतत द्वन्द की बात करता है,और निर्णायक संघर्ष को अवश्यम्भावी मानता है।किंतु समन्वयवाद की अवधारणा यह है कि प्रत्येक स्थिति में जीवन का यथार्थ अथवा सभी समस्याओं की परिणति #समन्वय है।
अतः संक्षेप में हम कह सकते हैं कि समस्या,संघर्ष और विपरीतता का सही विकल्प समन्वय है।समन्वय के बिना सर्वांगीण विकास,समेकित विकास ,मानव कल्याण और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की कल्पना असम्भव है।
परस्पर विपरीत गुणों का समन्वय ही सृजन है।किसी भी सात्विक समन्वय का विरोध ही विनाश है।
इन गहरी चालों में फंसकर
सत्ता के जालों में फंसकर
अपना दुःख पीछे करती है
जनता ऐसे ही मरती है।।
तुम बसते हो इसका कर दो
तुम हँसते हो इसका कर दो
तब जनता खुद पर हंसती है
जनता ऐसे ही मरती है ।।
अब नोट नए ही आएंगे
कुछ नोट नहीं चल पाएंगे
फाके में फिर भी मस्ती है
जनता ऐसे ही मरती है।।
जाएगा उनका जाएगा
आएगा अपना आएगा
ये सपने देखा करती है
जनता ऐसे ही मरती है।।
कोई राजा बन जाता है
जनता को क्या दे जाता है
जनता जनता ही रहती है
जनता ऐसे ही मरती है।।

ग़ज़ल

हम से कहता है इबादत में रहो।
साफ कह देता कि खलवत में रहो।।
तय हुआ हम अपना इमां बेच दें
तुमको रहना है तो गुरबत में रहो।।
आदमी  से जानवर हो जाओगे
और कुछ दिन उसकी सोहबत में रहो।।
तुमको भी ऎयारियां आ जाएंगी
चन्द दिन तुम भी सियासत में रहो।।
यूँ न रो उसकी जफ़ाओं के लिए
किसने बोला था कि उल्फ़त में रहो।।
साफगोई भी बवाले-जान है
सब ये कहते हैं शराफत से रहो।।

वो औरों की तरह

ये औरों की तरह नहीं है।
अपने दिल में गिरह नहीं है।।
पत्ते टूटे हैं शाखों से
मौसम ही इक वज़ह नही है।।
रात और दिन हैं एक बराबर
मेहनतकश की सुबह नहीं है।।
क्या लड़ना ऐसी बातों पर
जिनकी कोई सुलह नहीं है।।
तुम बिन मैं रह सकूँ कहींपर
ऐसी कोई जगह नहीं है।।
अनहद नाद सुना दे कोई।
मन के तार मिला दे कोई।।
खोया खोया रहता है मन
सोया सोया रहता है तन
तन से तान मिला दे कोई।।
कितने मेरे कितने अपने
सबके अपने अपने सपने
जागी आँख दिखा दे कोई।।
जनम जनम की मैली चादर
तन गीली माटी का अागर
आकर दाग मिटा दे कोई।।
साजन का उस पार बसेरा
जग नदिया गुरु ज्ञान का फेरा
नदिया पार करा दे कोई।।
तू कैसी भी नजर से देख जालिम
तेरा हर तीर दिल पर ही लगे है।
ये कैसी बेखुदी है,क्या नशा है
कि तू ही तू नज़र आती लगे है।।
 गली आबाद हो जिसमे तेरा घर
बहारों की गली जैसी लगे है।।
तेरा नज़रे-करम जबसे हुआ है
तू अपनी है नही अपनी लगे है।।
किसी भी गैर के पहलू में दिखना
हमारी जान जाती सी लगे है।।
हया हो ,शोखियाँ हो या लड़कपन
तुम्हारी हर अदा अच्छी लगे है।।