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Showing posts from November, 2012

भोजपुरी लोकगीत --गायक-मुहम्मद खलील

अमवा के बारी में बोले रे कोयिलिया ,आ बनवा में नाचेला मोर|
पापी पपिहरा रे पियवा पुकारे,पियवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे, छलकल गगरिया मोर  निरमोहिया रे,छलकल गगरिया मोर||...........छलकल .... सुगवा के ठोरवा के सुगनी निहारे,सुगवा सुगिनिया के ठोर, बिरही चकोरवा चंदनिया निहारे, चनवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे,.छलकल .... नाचेला जे मोरवा ता मोरनी निहारे जोड़ीके सनेहिया के डोर, गरजे बदरवा ता लरजेला मनवा भीजी जाला अंखिया के कोर   निरमोहिया रे,.छलकल .... घरवा में खोजलीं,दलनवा में खोजलीं ,खोजलीं सिवनवा के ओर , खेत-खरिहनवा रे कुल्ही खोज भयिलीं,    पियवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे,छलकल ....

भारत में वैश्विक आर्थिक मंदी बेअसर क्यों.

अभी हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने एक रिपोर्ट में कहा की वैश्विक मंदी का असर भारत पर इसीलिए नहीं हुआ,क्योंकि भारत की बैंकिंग व्यवस्था का बड़ा हिस्सा इन्टरनेट से नहीं जुड़ा था|कम से कम अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने मनमोहन को अप्रत्यक्ष रूप से सराहा|यद्यपि मैं इससे कतई सहमत नहीं हूँ|भारत की अर्थव्यवस्था वस्तुतः जटिल अर्थ व्यवस्था है|या यूँ कहे भारत एक मात्र ऐसा देश है ,जहाँ विनिमय और व्यापार क
े सभी स्वरुप प्रचलित हैं|यह ऐसा देश है जहाँ सरकारी,अर्ध सरकारी ,सहकारी,सार्वजनिक और निजी सभी प्रकार की व्यवस्थाएं एक साथ चल रही हैं|सभी सरकारी संस्थाओं में आउटसोर्सिंग के जरिये निजी क्षेत्र सक्रिय है|और सभी निजी क्षेत्र सरकारी ऋणों और अनुदान पर चल रहे हैं|सब्सिडी निजी क्षेत्र को उपकृत करने का ही एक माध्यम है|सभी चलते संस्थान घाटे में लाकर निजी हाथों में बेचे जाते हैं, और सभी निजी संस्थाओं के घाटे में जाने पर सरकार टेक ओवर करती है,ऋण माफ़ करती है,बेल आउट जारी करती है| इस प्रकार यहाँ राष्ट्रीयकरण और निजीकरण एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है| लेकिन मेरा मूल उद्देश्य उन बिन्दुओं को खोजना था की भार…