मित्र मेरे अनवरत बढ़ते रहे।
इसलिए हम दीप बन जलते रहे।। इक मरुस्थल विश्व जैसे नेह बिन आत्मा निर्मूल्य जैसे देह बिन नेह की खातिर भटकते ही रहे।। अंत खाली हाथ रहना था हमें था भ्रमित कुछ भी न मिलना था हमें जानकर अनजान हम बनते रहे।। प्रेम में मिलना बिछड़ना गौण है ये सभी तो प्रेम पथ के मोड़ हैं हम बिना विचलित हुए चलते रहे।। |
भोजपुरी लोकगीत --गायक-मुहम्मद खलील
अमवा के बारी में बोले रे कोयिलिया ,आ बनवा में नाचेला मोर| पापी पपिहरा रे पियवा पुकारे,पियवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे, छलकल गगरिया मोर निरमोहिया रे, छलकल गगरिया मोर||........... छलकल .... सुगवा के ठोरवा के सुगनी निहारे,सुगवा सुगिनिया के ठोर, बिरही चकोरवा चंदनिया निहारे, चनवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे, . छलकल .... नाचेला जे मोरवा ता मोरनी निहारे जोड़ीके सनेहिया के डोर, गरजे बदरवा ता लरजेला मनवा भीजी जाला अंखिया के कोर निरमोहिया रे, . छलकल .... घरवा में खोजलीं,दलनवा में खोजलीं ,खोजलीं सिवनवा के ओर , खेत-खरिहनवा रे कुल्ही खोज भयिलीं, पियवा गईले कवने ओर निरमोहिया रे, छलकल ....
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