होठ सबके है यहाँ बन्धे सिले।
कौन तोड़ेगा ये पथरीले किले।
आप ने साहस दिखाया गर्व है
वर्ना सब हमको शिखंडी ही मिले।।

सुना है जब से नेता हो गया है।
उसे कुछ कम सुनाई दे रहा है।।
गरीबी ख़त्म करने को कहा था
गरीबों को मिटाये जा रहा है।।

अगर उनको सुनने की चाहत नहीं है।
हमें भी सुनाने की आदत नहीं है।।
चलें दो कदम हम चलो दो कदम तुम
मुहब्बत है कोई मुरव्वत नहीं है।।




ठोकरें खा खा के आदी हो गया हूँ।
अपनी इस आदत से गांधी हो गया हूँ।।
हर तरफ धोखे ही धोखे देखकर
फितरतन मैं भी जिहादी हो गया हूँ।।

बोलना चाहते हैं सच हम भी
क्या करें हौसला नहीं होता।
काश बच्चों के पेट के आगे
भूख का काफिला नहीं होता।।

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