वो रंज वो अलम वो जमाने नहीं रहे।
अब हम सम्हल गए हैं दीवाने नहीं रहे।।
तूफ़ान में भी दे सकें इक दूसरे का साथ
उस दौर के वो समापरवाने नहीं रहे।।
अब किस के वास्ते जियें हम किसपे मर मिटें
जब वो हकीकतें वो फ़साने नहीं रहे।।
खुलते थे जो जकात  खैरात के लिए
वो दिल नहीं रहे वो खजाने नहीं रहे।।
अल्लाह जाने क्या है हमारे नसीब में
उनके शहर में अपने ठिकाने नहीं रहे।।
अब किसको अज़ल और कयामत पे है यकीन
अब इन्तेज़ार वाले जमाने नहीं रहे।।
साकी रहा  जाम  अब मैकदा रहा
वाइज के कारोबार के माने नहीं रहे।।
हम ख़ुदकुशी की राह पे यूँ चल पड़े अदीब
जीने के अपने और बहाने नहीं रहे।।

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