ग़ज़ल

कितनी तकलीफों से कितनी मुश्किल से।
दूर  हुआ  जाता हूँ  अपने  हासिल से।।
 हठ करता है प्यार किरायेदारी में
लाख निकालो पर कब जाता है दिल से।।
उसके प्यार में मरने की अभिलाषा है
यार सिफारिश कर दो  मेरे क़ातिल से ।।
राहों ने जीवन भर साथ निभाया है
हम ही दूर रहे हैं अपनी मन्ज़िल से।।
हम तो लड़कर ही आज़ादी लाये थे
भीख नहीं मांगी थी हमने चर्चिल से।।
पहले जितना नेह कलम कागज से था
अब उससे भी बढ़कर है मोबाइल से।।

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