ग़ज़ल

चिंता रुपी चूहे नींदे कुतर गए।
सपने रातों बिना रजाई ठिठुर गए।।
ग़म के सागर में हिचकोले खाने थे
तुम भी कितनी गहराई में उतर गए।!
परी कथाओं के किरदार कहाँ ढूंढें
दादा दादी नाना नानी किधर गए।।
कितनी मेहनत से चुन चुन कर जोड़े थे
गोटी सीपी कंचे सारे बिखर  गए।।
बचपन जिधर गया मस्ती भी उधर गयी
बिगड़ा ताना बाना जब हम सँवर गए।।

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