मेरी खूबी मेरे उनवान में दब जाती है।

मेरी खूबी मेरे उनवान में दब जाती है।
मेरी अज़मत मेरी पहचान में दब जाती है।।
मेरे अजदाद को तालीम की जहमत न हुयी
मेरी उम्मत इसी एहसान में दब जाती है।।
मेरे शायर को भी शोहरत मिले इनाम मिले
हसरतें ये दिल-नादान में दब जाती हैं।।
अपनी सरकार है ये जुल्म कहाँ करती है
अब रियाया इसी गूमान में दब जाती है।।
आज रोटी के लिए फ़िक्र गयी बात हुयी
भूख अब हिन्दू-मुसलमान में दब जाती है।।
ख्वाहिशें,हसरतें भी शौक भी उम्मीदें भी
वक्त के तुगलकी फरमान में दब जाती हैं।।
अच्छी बातें जो लिखी गीता-ओ-कुरआन में हैं
मुद्दा-ए-गीता-ओ-क़ुरआन में दब जाती हैं।।

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