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 क्या कहा हौलनाक है ही नहीं। इस से बढ़कर मज़ाक है ही नहीं।। इश्क़ को इत्तेफ़ाक़ जायज़ है हुस्न को इत्तेफाक है ही नहीं।। हुस्न परदा करे करे ना करे इश्क़ पर झाँक-ताक है ही नहीं।। आशिक़ी क्यों न हो तेरी ख़ारिज तू गिरेबान चाक़ है ही नहीं।। साहनी तुझ को होश है अब तक तू मिरा इश्तियाक़ है ही नहीं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 खुशी के पल सँजोना चाहती है। तमन्ना हँस के रोना चाहती है।। फलक बेशक़ जगाना चाहता हो ज़मीं भर नींद सोना चाहती है।। उसे मुझ से मुहब्बत खाक़ होगी वो नादाँ है खिलौना चाहती है।। थकी जाती है फिर भी ज़िंदगानी खुद अपनी लाश ढोना चाहती है।। मुहब्बत में मेरी हस्ती बिखर कर सरापा नूर होना चाहती है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हक़ में उठती आवाज़ों पर पहरा देता है। ये मज़लूमों को अपराधी ठहरा देता है।।
 शिद्दत से तेरे ख़्वाब संजोये भी नहीं हैं। क्या खाक़ हँसें ख़ुद पे तो रोये भी नहीं हैं।। डर है कि तेरे ख़्वाब परेशान न कर दें क्या जागें अभी ठीक से सोये भी नहीं हैं।।
 उसने क्यों तर है मेरा रुमाल नहीं पूछा। ख़ूब पता है क्यों उसने अहवाल नहीं पूछा।। क्या पत्थर से शिकवा करते जब आईने ने देखा समझा फिर भी मेरा हाल नहीं पूछा।।
 पद पर जब तक रहे घूमते फिरते थे अकड़े। सोच रहे हैं अब भी दुनिया उनके पैर पड़े।। नहैं किसी से रामरहारी दुआ सलाम नहीं उससे सीधे मुँह ना बोले जिससे काम नहीं अपने मातहतों के सिर पर हरदम रहे खड़े।। क्या मजाल थी कोई काम के लिये उन्हें टोके हाँ टेबल के नीचे वाले काम नहीं रोके कम वेतन में आमदनी के स्रोत मिले तगड़े।। अफसर थे तो कदम कदम पर सेवा टहल रही आज नहीं हैं ठसक अफसरी फिर भी मचल रही आज मेम भी सोच रही हैं कौन धुले कपड़े।। सुरेश साहनी कानपुर रिटायर 9451545132
 कुछ इतने दूर तुम रहने लगे हो। जनम के अजनबी लगने लगे हो।। कभी बादे-सबा थे तुम हुआ क्या ये किस अंदाज़ में बहने लगे हो।। नहीं होता है अब इक शेर नाज़िल तो क्या  खारिज़ हमें करने लगे हो।। जो हमको देखकर चौंके हो जानम ये तुम किस बात से डरने लगे हो तुम्हें  वो साहनी भी चाहता है कहीं तुम तो नहीं  मरने लगे हो।। साहनी सुरेश कानपुर
 हुये रिटायर जान रहे हैं लेकिन पाल गुमान रहे हैं साहब अब भी अहंकार वश ख़ुद को साहब मान रहे हैं।। सोच रहे हैं कल भी उनको बाबू लोग सलामी देंगे और मुहल्ले वाले उनको अब भी साहब ही बोलेंगे कितनी ठसक रही है आख़िर वे  दफ्तर की शान रहे हैं।। और विदाई वाला मन्ज़र याद सुबह और शाम रहेगा सब बोले थे जब तक धरती है साहब का नाम रहेगा यूँ भी उनके आगे पीछे दस दस ठो दरबान रहे हैं।। लेकिन इन दो चार दिनों में बदल गया है सारा मन्ज़र अब पड़ोस के ठलुवे इनको समझ रहे है रंक बराबर किंतु ख़यालों में साहब जी अब भी ख़ुद को तान रहे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ढूँढने अक्सर हमें जाते हैं हम। हम नहीं मिलते तो घबराते हैं हम।। जब  नहीं मिलते ज़हाँ की भीड़ में लौट कर तन्हा चले आते हैं हम।। क्या जिसे दैरोहरम में खोजते मयकदे में रूबरू पाते हैं हम।। अब भी दिल करता है तेरी आरज़ू अब भी अपने दिल को समझाते हैं हम।। टूटता है अब भी जब तारा कोई तब दुआओं में तुझे लाते हैं हम।। साहनी के ख़्वाब कब के लुट चुके क्या तुम्हारे ख़्वाब में आते हैं हम।। सुरेश साहनी अदीब
 क्या बचता प्रतिबिम्ब तुम्हारा  मन दर्पण तो टूट चुका है। जितना मुझसे हो सकता था उससे अधिक निभाया मैंने एक तुम्हारी ख़ातिर कितने अपनों को ठुकराया मैंने क्या बोलूँ जब मुझसे मेरा अपना दामन छूट चुका है।।..... इस मंदिर में तुम ही तुम थे जिसका प्रेम पुजारी था मैं पर तुमको यह समझ न आया सचमुच बड़ा अनाड़ी था मैं  प्रेम कहाँ अब बचा हृदय में हृदय कलश तो फूट चुका है।।.... माना मेरा दिल पत्थर है दिल में किन्तु तरलता भी है ऊपर ऊपर भले तपन   है पर मन मे शीतलता भी है किसको दोष लगाऊँ मुझसे आज समय तक रूठ चुका है।।... सुरेश साहनी 20अप्रैल 2019
 वो मुझे भूल भी जाता तो कोई बात न थी। फिर कभी याद न आता तो कोई बात न थी।। फिर कोई बात थी ऐसी तो बताता मुझसे या किसी को न बताता तो कोई बात न थी।।
 तुम्हें मैं और कितना याद रखता। कहाँ तक ज़िन्दगी नाशाद रखता।। ज़हाँ की हर ख़ुशी है तुमको हासिल तुम्हारे ग़म कहाँ आबाद रखता।। बुते-काफ़िर पिघल जाते यक़ीनन जो मैं जाकर वहाँ फ़रयाद रखता।। कफ़स के हक़ नहीं मानी वगरना तुम्हारा नाम मैं सय्याद रखता।। जो अज़मत इश्क़ की मालूम होती तो हरगिज़ हुस्न को बुनियाद रखता।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
बेशक़ नहीं हैं उसकी तरह महज़बीन हम। ये और बात है कि नहीं कम हसीन हम।। बेशक़ है एहतराम भी खैरमकदम भी है ये और बात उससे नहीं मुतमईन हम।।  बेशक़ कि लासवाल हैं कुदरत के फैसले कुछ बात हैं कि उनसे नहीं मुतमईन हम।।
 मैंने सोचा था भले किरदार को पूजेंगे सब। क्या पता था एक दिन ऐयार को पूजेंगे सब।। पैरवी में झूठ की मशरूफ़ हर अख़बार है    कैसे कह दें कल के दिन अख़बार को पूजेंगे सब।। आज ईसा और मूसा पायेंगे दार-ओ-सलिब और कल बढ़कर सलीब-ओ-दार को पूजेंगे सब।। कह के बाज़ारु अदब को कर रहे थे जो ज़लील क्या पता था कल इसी बाज़ार को पूजेंगे सब।।
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 जब उषा को बिन बताये रार कर निकला नून लकड़ी तेल की तक़रार पर निकला साँझ फिर मनुहार कर स्मित अधर लौटा।।
 भले ही तुम्हारे साथ गलत हुआ लेकिन उसकी ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। माननीय हाइ कोर्ट ठीक ही तो कहा है साहब ने। तुम अपने अंग साथ लेकर क्यों घूमती हो। यही बात तो भागवत जी बोलते हैं कि स्त्री घर सम्हालते हुये ही अच्छी लगती हैं। कॉलेज में सैकड़ों लड़कियां हैं।तुम्हारे साथ ही क्यों? क्या ज़रूरत है घर से बाहर निकलने की? अब ये अलग बात है कि सुरक्षा तो घर परिवार में भी नहीं है। घर से विद्यालय आते जाते बच्चियों पर घर के नुक्कड़ से स्कूल के मोड़ कहाँ वहशी निगाहें नहीं चुभती हैं। ऑटो में,टैक्सी में,बस में या फिर ट्रेन में हर जगह तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार के लिये तुम ही ज़िम्मेदार हो। बुआ ठीक तो कह रही," तुम्हाये जीजा हैं।आधो हक़ तो बनतो है'। कोई बात नहीं देवर है समझा देंगे। या छोड़ो भी एक महीना तो जेठ का भी होता है। तुम भी सम्हाल के चला करो"  वैसे भी तुम्हें सहन कर लेना चाहिये। दरोगा जी का पूछना जायज है। तुम चिल्लाई तो किसी ने सुना क्यों नहीं। वकील साहब तो और पढ़े लिखे हैं वो तुम्हारे दर्द का आकार और अंगवस्त्र के नम्बर भी पूछ सकते हैं।  तुम्हारी शिकायत  सही नहीं तुम ही गलत हो। प्रधान जी सही कह...
 बरसे कम्बल भीजे पानी पढ़ते हो। क्यों कबीर की उल्टी बानी पढ़ते हो।। कौन हुआ है पंडित ढाई आखर से क्यों तुम ऐसी गलत बयानी पढ़ते हो।। मगहर भेजे ही जाओगे काशी से नाहक़ साखी सबद रमानी पढ़ते हो।। सबहिं नचावत राम गुसाईं मालुम है फिर भी भोला अवढर दानी पढ़ते हो।। कुछ तो हटकर था  कबीर में जिस से तुम उस अनपढ़ को होकर ज्ञानी पढ़ते हो।। अम्मा के जीते जी आंगन बाँट लिया आख़िर कैसी रामकहानी पढ़ते हो।। तुम सुरेश अपने अन्दर कब झांकोगे औरों की  तो कारस्तानी पढ़ते हो।। सुरेश साहनी कानपुर
 जाना हुआ फुज़ूल गये क्यों। आख़िर तुम स्कूल गये क्यों।। जाति बहुत माने रखती हैं यह कड़वा सच भूल गये क्यों।। ख़्वाब जिबह होने तो तय थे बनकर तुम मक़तूल गये क्यों।। अब कालीदह में यमुना है फिर कालिन्दी कूल गये क्यों।। अब भी वही हस्तिनापुर है एकलव्य तुम भूल गये क्यों।। साकी नासेह से वायस था तुम कब थे मक़बूल गये क्यों।। सुनो साहनी हर सवाल का है जवाब माकूल गये क्यों।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 किस मन की बात सुनें क्या मन की बात करें। सावन में तुम बिन क्या सावन की बात करें।। क्यों इनकी बात करें क्या उनकी बात करें। क्यों ना हम राधा और मोहन की बात करें।। सर्पों से लिपटे ज्यों चंदन की बात करें। विरहानल में जलते दो तन की बात करें। घावों पर मरहम के लेपन की बात करें।। मिश्री सी बात सुनें माखन की बात करें आओ हम राधा और मोहन की बात करें। ग्वालों की गोपियन की गैय्यन की बात करें।। बंशी की धुन पर सुध रीझन की की बात करें गुंजन की बात करें, मधुवन की बात करें।। किस मन से यशुदा के नन्दन की बात करें।। पुष्प पथ में बिछाये हैं रख दो चरण। आपसे स्नेह का है ये पुरश्चरण।।   प्रीति के पर्व का यह अनुष्ठान है दृष्टि का अवनयन लाज सोपान है सत्य सुन्दर की सहमति है शिव अवतरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।। कुछ करो कि स्वयम्वर सही सिद्ध हो सिद्धि हो और रघुवर सही सिद्ध हो शक्ति बन मेरे भुज का करो  प्रिय वरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।।  ओम सत्यम शिवम सुन्दरम प्रीति हो युगयुगान्तर अमर प्रीति की कीर्ति हो लोग उध्दृत करें राम का आचरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।।
 वेदने रहो मम अन्तस् में क्या एकाकिनि बन कर जीना पग पग पर साथी हूँ सहचर क्यों सन्यासिनि बन कर जीना हो खंडित शील अहिल्या से बन्धक मन भाव शिलाओं के है वन अशोक में शोकाकुल तन दग्ध विदेह सुताओं के मम उर आश्रय है जब साथी क्या सौदामिनि बन कर जीना.... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 जो मिला उससे ख़ुश नहीं इंसां उससे नाख़ुश है जो मिला ही नहीं।।साहनी
 इश्क़ है इश्क़ दिल्लगी से अलग इश्क़ है आम ज़िन्दगी से अलग इश्क़ से हर किसी को नफ़रत है इश्क़ रहता है हर किसी से अलग इब्ने-इब्लीस तो नहीं आशिक़ कुछ तो है इसमें आदमी से अलग जाति वाले भी फ़र्क़  रखते हैं इश्क़ है हर बिरादरी से अलग शेख़ क्या कुफ़्र है मुहब्बत में इश्क़ में क्या है बन्दगी से अलग साहनी  छोड़ दे कलम या फिर इश्क़ को कर दे शायरी से अलग साहनी सुरेश, कानपुर
 तेरे भी माँ बाप सोचते यदि कुछ ऐसा  क्या तब तू इस दुनिया में आ पाया होता
 जो दमे-इश्क़ भर रहा होगा। कोई अहले-जिगर रहा होगा।। हुस्न बेशक़ उधर रहा होगा। आईना सज सँवर रहा होगा।। राहे-मक़तल चुनी है उल्फ़त ने मौत से खाक़ डर रहा होगा।। यार जैसा जलाल नामुमकिन लाख शम्सो-क़मर रहा होगा।। यूँ कभी हिचकियाँ नहीं आती वो मुझे याद कर रहा होगा।। हम ग़मे-हिज़्र से परीशां हूँ क्या उसे भी अखर रहा होगा।। दिल चुरा ले गया सरेमहफिल उसमें कितना हुनर रहा होगा।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 फिर से वही नादानियाँ करने लगे हैं हम। कुछ भी हो बदगुमानियाँ करने लगे हैं हम।। यूँ बन सँवर के घूमना आईने ढूंढना अपनी ही निगेहबानियाँ  करने लगे हैं हम।।
 क्या हुआ होश में हम जो आने लगे। फिर से अपने कदम डगमगाने लगे।। ठौर भी उस गली के ठिकाने लगे। आशिक़ी तेरे करतब सुहाने लगे।। दिल हमारा था जिसने भी चोरी किया क्यों नज़र हम उसी से चुराने लगे।। कुछ जुनूँ कोई वहशत दिखी क्या कभी फिर कहाँ से उसे हम दीवाने लगे।।
 दिल की दुनिया जवान है अब भी। हौसलों में उड़ान है अब भी।। और ताबीर क्यों नहीं होंन्गे उसके ख़्वाबों में जान है अब भी।। दर्द तेरे न दर-ब-दर  होंगे जिस्म अपना मकान है अब भी।। हुस्न की शोखियाँ अज़ल से हैं इश्क़ शीरी ज़ुबान है अब भी।। फिर वहां हम नहीं गये लेकिन दर्दे-दिल की दुकान है  अब भी।। लग रहा जान लेके मानोगे क्या कोई इम्तिहान है अब भी।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 वक़्त के साथ ढल न जाओगे। कैसे मानें  बदल  न जाओगे।। ख़ाक़ सम्हलोगे जो गिरोगे नहीं गिर गये तो सम्हल न जाओगे।। वक़्त की चाल लाख धीमी हो उससे आगे निकल न जाओगे।। जा न पाओगे इश्क़ के घर मे जो वहाँ सिर के बल न जाओगे।। हम यूँ जलवानुमा नहीं होंगे कैसे माने मचल न जाओगे।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 कश्ती में हलचल हो जाये। आओ एक ग़ज़ल हो जाये।। इश्क़ सरापा नूरानी हो हुस्न ज़रा श्यामल हो जाये।। बाहों को पतवार बना लें बेशक़ जग जलथल हो जाये।। मन घट प्रणयामृत से भर लो भव पथ सुगम सरल हो जाये।। उठें हिलोरें  फिर संगम की तन शुचि मन निर्मल हो जायें।। कौन क़यामत तक रुकता है बेहतर है इस पल हो जाये।। आज सुरेश मिला है मिल लो ख़ूब सुना है कल हो जाये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ज़िन्दगी के विराम तक पहुँचे। अन्ततः हम मक़ाम तक पहुंचे।। इक तिरा दर नहीं मिला अब तक जबकि हम गाम गाम तक पहुंचे।। जब तअल्लुक़ ही तर्क है उनसे कोई कैसे सलाम तक पहुँचे।। उस ख़ुदा के ही इंतज़ाम हैं सब आप किस इंतज़ाम तक पहुँचे।। हौसले से उछालिये पत्थर बात कुछ तो निज़ाम तक पहुँचे।। दे रहा है वो विष ज़माने के कोई मीरा न श्याम तक पहुँचे।। बेख़ुदी तक वली पहुंचते हैं शेख भी सिर्फ़ जाम तक पहुँचे।। काश मजमून भांपते दिल का आप बस जिस्मे-खाम तक पहुँचे।। @highlight  सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ख़ुद को खुलकर किताब करना है। याने सबका हिसाब करना है।। हुस्न है क़ाबिले गुरुर सही इश्क़ भी लाजवाब करना है।।
 मेरे दो सहकर्मी आपसी बातचीत में मशगूल थे। उनके चेहरे बता रहे थे कि वे दोनों किसी गम्भीर चर्चा में निमग्न हैं। इस बीच मैं उनके नज़दीक पहुंच चुका था। स्वभावतः मैंने पूछ लिया क्या बातें चल रही हैं भाई!क्या शेयर बाज़ार से जुड़ी बात है?  मित्र ने जवाब दिया," ऐसा कुछ नहीं भैया ! बस उज्ज्वल भाई कह रहे हैं कि ड्रम से बहुत डर लगता है। और यह बात मैं भी मानता हूँ!   मैंने उत्सुकता वश पूछा," ऐसा क्यों?   मित्र ने बड़े गम्भीर और शांत स्वर में कहा," भैयाजी! 16 टुकड़े ड्रम में ही मिले थे। और मेरे घर में तो दो ड्रम हैं।'     जाने क्यों मैं भी उनके भय से सहमत लगा।खैर!!!! अभी कल की बात है । मेरे मित्र सुकुल जी बता रहे थे कि यार गेहूँ कटाई का सीजन आ रहा है।और पण्डिताइन  दो ड्रम खरीदने का फरमान जारी करी हैं।  और तुम्ही  दिलाओगे। हास्य व्यंग्य
 अपने दिल की भी क्यों कही न करें। क्या करें हम जो आशिक़ी न करें।।  उज़्र था उनको तीरगी से कभी अब वो चाहें हैं रोशनी न करें।। मर्ज़े-उल्फ़त से है शिकायत भी फिर कहे हो इलाज भी न करें।। इश्क़ भी बेख़ुदी में कर गुज़रे होश  वाले तो ये कभी न करें।। फिर ये आदाब भी ज़रूरी हैं ये ग़लत है कि हम सही न करें।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 मैंने एनसीआर में अधिवास करने वाले एक कवि साथी से चर्चा की। मेरी इच्छा थी कि भारत की साहित्यिक राजधानी में एक काव्य कलरव कार्यक्रम का आयोजन  किया जाय। किसी शुभेच्छु ने सुझाव दिया था कि इस क्रम में दो एक गिद्ध भी मंच पर शोभायमान होंगे तो कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ जाएगी। मैंने इसी लिए अपने दिल्ली प्रवास के दौरान उन साथी को  फोन मिलाया। लेकिन उनसे संवाद के पश्चात मैं जैसे भकुआ गया।  उन्होंने पूछा किसको किसको अपने मंच पर बुलाना चाहते हैं?   मैंने उनसे काव्य जगत के अम्बानी जी को अपनी वरीयता सूची में प्रथम स्थान पर बिठा रखा था सो उनका ही नाम ले लिया।   साथी कवि ने बड़ी सहजता से बोला, 'बीस लाख प्लस जीएसटी,।  मैंने कहा , कुछ कम मूल्य में दयावान कवियों के नाम बताइए।' देखिए आपको अच्छा कार्यक्रम कराना है कि कविता करवानी है। अगर अच्छा कार्यक्रम करवाना है तो लगभग तीस लाख की व्यवस्था कर लीजिये। वरना आप से अच्छा कवि कौन है! अपने जैसे दस कवि बुला लीजिये।कार्यक्रम हो जायेगा।  मैंने कहा कि भाई आप ही आ जाइयेगा। उन्होंने कहा कि,' डेढ़ लाख दे दीजिएगा। मैं भी आ जाऊँग...
 मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है। या तहरी के साथ रसीली सी तरकारी है।। इसमें कन्या भ्रूण बचाने वाली लाइन है कन्या को भरपूर पढ़ाने वाली लाइन है मेरी  कविता पूरी तरह दहेज विरोधी है इसमें नारी हक़ दिलवाने वाली लाइन है इस कविता में सकल सृष्टि की रक्षक नारी है।..... मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है।।...... मैंने इस कविता में वन रक्षण पर बोला है वन जीवों पर गौरेया संरक्षण पर बोला है पर्वत नदियां हिमनदियों और जंगल की रक्षा सकल धरा पर बढ़ते परदूषण पर बोला है मेरी कविता मंचों की पूरी अधिकारी  है।। मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है।।...... इस कविता में सभी तरह के मिर्च मसाले हैं इसमें ओज देशभक्ति के तड़के डाले हैं इसमें पाकिस्तान को हमने धमकी भी दी है और चीन को विश्व शान्ति के मैसेज डाले हैं मेरी कविता रंग बिरंगी सबसे न्यारी है।। मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है।।...... हास्य व्यंग्य सुरेश साहनी, कानपुर
 यूँ कवियों की भीड़ बहुत है  महफ़िल महफ़िल किंतु वास्तविक कवि हैं कितने कहना मुश्किल श्रोता भी अब कहाँ किसी को जाँच रहे हैं उधर सबल जी किसी सरल को बाँच रहे हैं कोई झंझट कोई करपट कोई बेदिल कविता का दिल तोड़ रहे हैं सारे हिलमिल..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132  हास्य व्यंग्य
 कभी कभी ऐसी ऐसी फ्रेंड रिक्वेस्ट आती है कि मन तीन चार दशक पीछे की ओर ऐसे भागने लगता है जैसे कि कउनो जवान बछरू कुलांच मारै। मन का मयूर कहरौवा नाच नाचने लगता है।अब एहिमा हँसने की क्या बात है! कउनो हम बुढा गये हैं क्या?   खैर  यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है।जब बड़े बड़े ऋषि मुनि डोल जाते हैं तो हमारे जैसे आम की क्या बिसात कि चैत फागुन में ना बौराये।एक बार बढ़िया तो लगा। देखा कि हमारे कई विभागीय सन्तजन भी उनकी मित्र सूची में शामिल हैं। सो उनकी फिरेन्ड रिकवेस्ट स्वीकार करने के कई आधार बन रहे थे। और कवियों के बारे में यूँ कहाँ गया है कि ,"सुवरण को खोजत फिरत कवि,व्यभिचारी, चोर।।'  फिर भी जैसा कि अपनी पुरानी आदत है कि सोशल मीडिया पर हम    सोच विचार जाँच पड़ताल के बाद ही मित्र बनाते हैं।सो प्रोफाइल देखा। अब क्या बताये इतनी सुंदरता देखने के बाद बुद्धि तो जैसे घास चरने चली गयी। कुछ देर बाद जब लौटी तो देखा मैदान उतना साफ नहीं है।कई और जाने पहचाने जनावर पहले से चरन्त मुद्रा में उपस्थित हैं।अतः उत्साह थोड़ा सा तो ठण्डा हुआ।लेकिन दिल तो पागल है ना सो ठीक कैसे हो एकता है। ख़ै...
 प्रेम में पड़कर क्या खोना क्या पाना था बस तुमको मैं मुझको तुम हो जाना था हँस पड़ता हूँ जब वो दिन याद आते हैं तुम  नादां तो थी    मैं भी दीवाना था सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 वो हसीं रात फिर कभी न हुयी। आपसे बात फिर कभी न हुयी।। साथ बारिश में भीगना तय था यूँ के बरसात फिर कभी न हुयी।।
 चुप रहो इक मुकम्मल ग़ज़ल बन सके प्यार का ख़ूबसूरत महल बन सके ताज तैयार होने तलक चुप रहो।। चुप रहो प्यार होने तलक चुप रहो।।साहनी
 क्या तआरुफ़ है मेरा भूल गए। बाखुदा हम तो ख़ुदा भूल गए।। एक बस तेरी गली याद रही और हम अपना पता भूल गए।। तुझको मालूम नहीं है ये अदा क्या नहीं तेरे सिवा भूल गए।। इसमें हैरत की कोई बात नहीं तुम अगर तर्ज़े-वफ़ा भूल गए।।
 क्या ज़रूरी है ओहदे पर हो। तुम किसी हाल में मोहतबर हो।। प्यार रिश्तों में हो ज़रूरी है फिर महल हो कि फूस का घर हो  ।। चाँद तारों की क्या ज़रूरत है जीस्त जब प्यार से मुनव्वर हो।। हम हैं उल्फत के आस्ताने से कोई बेशक़ बड़ा सिकन्दर हो।। साहनी कौन जानता है तुम्हें अब न कहना कि तुम सुख़नवर हो।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 प्रेम सौंदर्य की अर्चना कर सके नैन नत हो प्रणय याचना कर सके  रूप रतनार होने तलक चुप रहो।। चुप रहो प्यार होने तलक चुप रहो।।
 यदि जनता के साथ चलें तो सरकारों का गिरना तय है आज मशीनों का बहुमत है जनता का मत क्या मतलब है सब कुछ पूँजी से होना है सब हों सहमत क्या मतलब है सत्ता की ताकत को समझो हर विरोध का मरना तय है तुम  करते थे चोरी थी जो हम करते है  अब विकास है आओ साथ नहा लो गंगा उन्नति का ग्लोबल प्रयास है हरिश्चन्द्र अब क्या कर लेंगे रोहिताश्व का मरना तय है..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हमें हम छोड़कर बढ़ने लगे हैं। कई इस बात से कुढ़ने लगे हैं।। बहुत पछताए उन पर कहके गज़लें हमी सुनने हमीं पढ़ने  लगे हैं।। लगे है जा चुका है दौर अपना हमें सब फ्रेम में जड़ने लगे हैं।।  ये डर है बदगुमां करदे न शोहरत हवा में कुछ तो हम उड़ने लगे हैं।। कभी था साहनी भी एक शायर मगर अब सब उसे पढ़ने लगे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 कब न थे कब थे हमारी ज़िन्दगी के मायने। आप कब समझे हमारी किस खुशी के मायने।। मेरे जीते जी न समझा जो हमारे दर्द को क्या समझता फिर हमारी खुदकुशी के मायने।। हुस्न वालों को पता है हुस्न की रांनाईयाँ इश्क़ वाले जानते हैं आशिक़ी के मायने।। जिस ख़ुदा की राह में मरता रहा है आदमी क्या पता है उस ख़ुदा को बन्दगी के मायने।। हम से बेपर्दा हुआ जो क़ुर्बतों के नाम पर वो हमें समझा रहा है पर्दगी के मायने।। जो चरागों को बुझाने में हवा के साथ थे क्या  बतायेंगे हमें वो रोशनी के मायने।। कितनी दरियाओं का पानी पी रहा है रात दिन इक समन्दर को पता है तिश्नगी के मायने।। सुरेश साहनी, कानपुर
 और जाते भी तो कहाँ आख़िर। छोड़ कर क़ू-ए-जाने-जां आख़िर।। हम गदायी हुये तो हैरत क्यों कैसे बेहतर है लामकां आख़िर।।
 किस वफ़ा की तलाश है तुमको क्या ख़ुदा  की तलाश है तुमको।। इश्क़ तुमको हुआ यकीन नहीं जब अना की तलाश है तुमको।। जिसको सुन कर वो लौट सकता था उस सदा की तलाश है तुमको।। कुछ तो सपनों से ख़ुद को दूर करो क्या हवा की तलाश है तुमको।। सुरेश साहनी कानपुर
 ये सोचकर कि सवेरे का क्या भरोसा है घनेरी रात को पूरी तरह जिया मैंने।।साहनी
 यूँ कम नहीं कमाया तुमने घर परिवार बनाया तुमने उठना भारी जहाँ स्वयं का सब का बोझ उठाया तुमने
 आज अपने ख़िलाफ़ है सब कुछ मूड क्या आज ऑफ है सब कुछ मेरा उसका बंटा हुआ क्या है प्यार में हाफ हाफ है सब कुछ कुछ भी पढ़िए कोई न बोलेगा गोष्ठी में मुआफ़ है सब कुछ नींद जाने किधर है क्या बोलें यूँ तो बिस्तर लिहाफ है सब कुछ मेरा दिल मेरी जेब आईना और मौसम भी साफ है सब कुछ सुरेशसाहनी, कानपुर
 क्यों इतने बदहवास से बैठे हुए हो तुम। मुद्दत हुई उदास  से बैठे हुए हो तुम।। कपड़े नहीं ख़याल से जो बरहना लगे कुछ ऐसे बेलिबास से बैठे हुए हो तुम।।
 जब भी उसका ख़याल आया है। चश्मेंनम में उबाल आया है।। किसको दरकार है जवाब मिले आख़िरश क्यों सवाल आया है।।
 जीवन गोया यातना की बहुतेरी किस्म। रूह सदा ढोती रही मन पर बोझिल जिस्म।। दैहिक भौतिक मानसिक या फिर दैविक ताप । इन सब से  भारी रहे   सामाजिक सन्ताप ।। चाहत से चिन्ता बढ़ी बड़ी व्यर्थ परवाह। हुआ भिखारी के सदृश  मन का दौलतशाह।।
 ज़िन्दगी की यही कहानी है। रूह धोखा है जिस्म फानी है।। सिर्फ़ दो दिन हैं हुस्न के नखरें इश्क़ में फिर भी जावेदानी है।।साहनी
 शब्द शब्द से हुए पराये अक्षर अक्षर से ही रूठे। मैं भी गीत कहाँ से लिखता भाव कहाँ से लाता झूठे।। जब तुम थे ऐसा लगता था जैसे मुझको सब हासिल है कविता कहना कठिन नहीं है  गीत सजाना कब मुश्किल है ये सब मेरे खेल खिलौने छूट गए तब जब तुम छूटे।। अक्षर ब्रम्ह जगत मिथ्या पर शब्द सशक्त कहे जाते है किन्तु वियोगी-पद लेते ही भाव विरक्त हुए जाते हैं होती सफल साधना कैसे ,सारे पुण्य समय ने लूटे।। खण्ड खण्ड हो गयी सृजनता महाकाव्य रह गए अधूरे जीवन की चलती चाकी में शेष बचे गीतों के चूरे टेक तुम्हारी पकड़ बच गए तुलसी से दो एक अनूठे।। सुरेशसाहनी
 मैं हैरां हूँ कि मैं इस दौर में हूँ। गनीमत है कि अब भी दौड़ में हूँ।। यहाँ अब जिंदगी जद्दोजहद है मैं अपने आप से ही होड़ में हूँ।। ग़नीमत है कि मेरा वोट भी है नहीं तो मैं कहाँ किस जोड़ में हूँ।। मुझे इंसान कब समझा किसी ने सभी के वास्ते मैं और में हूँ।। मैं इंसां हूँ इसी से मर रहा हूँ मैं दिल्ली में हूँ या लाहौर में हूँ।। सुरेशसाहनी
 माँ की दो रोटी में जैसे जग का प्यार छुपा  रहता था भूख नहीं होती थी तब भी  स्वतः भूख जागा करती थी अब भी दो रोटी आती है  किंतु औपचारिकताओं से पूरित स्नेह स्वार्थ मिश्रण अभिगुँथित  बड़े सलीके से उच्चारित कह दो तो दो और बना दूँ कैसे कह दूँ सोच रहा हूँ भूख मिट गई पेट भर गया फिर भी ऐसा क्यों लगता है मन जैसे संतृप्त नहीं है पढ़े लिखे हैं शिक्षित घर हैं सुविधाओं की कमी नहीं है अब चूल्हों में धुंआ नहीं है सोच रहा हूँ फिर से घर मे मिट्टी का चूल्हा ले आऊँ माँ तेरे खुरदुरे हाथ भी  कितने नरम नरम लगते थे शायद उनमे नेल नहीं थे नोक नुकीले पॉलिश वाले मां अनपढ़ थी पर अच्छी थी..... सुरेशसाहनी, कानपुर
 न सँवर सके न सुधर सके गए तुम तो हम भी गुज़र गए तेरे साथ जितना चले चले तेरे बाद जैसे ठहर गए।। तेरी तरह हम न बदल सके रहे जैसे वैसे  ही रह गये  तेरे साथ चलना था दो कदम तेरे बाद थम के ही रह गये कभी मंज़िलों ने भुला दिया कभी छोड़ राहगुज़र गए।। न सँवर...... तुम्हें देखना है तो देख लो यहीं पास अपनी मज़ार है दो घड़ी सुकून से बैठ लो वो ख़मोशियों का दयार है फ़क़त इसलिए कि पता रहे जो अदीब थे वो किधर गए।।न सँवर...... यहाँ आके आँखें न नम करो तुम्हें किसने बोला कि ग़म करो जिसे प्यार था वो चला गया तो क्यों पत्थरों को सनम करो जो असीर थे वो नहीं रहे तेरे हुस्न के भी असर गए।।न सँवर......
 मैं गंगा हूँ-2 तन से शीतल ,मन से निर्मल धोती हूँ जन जन के कलिमल शिव ने धारा है मस्तक पर आवाहन करता है सागर मत समझो मैं सिर्फ नदी हूँ पाप नाशिनी विष्णुपदी हूँ... गोमुख से गंगा सागर तक बहती आयी हूँ निष्कंटक भारत की  जीवन धारा हूँ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा हूँ तर्पण और वजू का जल हूँ आबे-जमजम गंगाजल हूँ..... मेरा मन तबसे टूटा है अपनों ने मुझको लूटा है मेरा जल चोरी होता है प्यासों को बेचा जाता है और मेरी अपनी संताने बाँध रहीं जाने अनजाने..... खुश थी मैं आयी आज़ादी पर मुझको बेड़ी पहना दी मैं उन्मुक्त सरल आनन्दी अपने ही घर मे हूँ बंदी बेटे माँ को छोड़ रहे हैं मेरी धारा मोड़ रहे हैं..... अब ये सांसे छूट रही है मेरी हम्मत टूट रही है गन्दा जहर प्रदूषित पानी कचड़ा मलवा नाला नाली यह विनती है सुन लो बेटों मुझमें मिलने गिरने मत दो सीधी ज़हर ख़ुरानी रोको इन नालों का पानी रोको जगह जगह मुझको मत बांधो मेरे सब अवरोध हटा दो
 उनसे मिलने के बहाने ढूंढें। फिर मुहब्बत के ज़माने ढूंढें।। फिर कहानी में रवानी आये दास्ताँ खोजें फ़साने ढूंढें।। हम तो उनमें ही उन्हें ढूढेंगे किसलिए ग़ैर के साने ढूंढें।। कौड़ियाँ सीपियाँ कंचे पत्थर थे जो बचपन के खजाने ढूंढें।।
 ज़िन्दगी अपने कैदखाने से। दूर ले चल किसी बहाने से।। सब हैं अपने ही आस्ताने से। क्या शिकायत करें ज़माने से।। सब समझते हैं होश है मुझको बाज़ आया मैं लड़खड़ाने से।। तेरे दर पे भी सरनिगू है हम क्या मिला तेरे पास आने से।। लोग सुनकर हँसी उड़ाते हैं दर्द घटते नहीं बताने से।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 अगर दिलजू नहीं आये चलेगा तो दिल काबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत सीख लो इतना बहुत है कोई जादू नहीं आये चलेगा ये है काग़ज़ के फूलों का ज़माना कोई खुशबू नहीं आये चलेगा मुहब्बत हम की हस्ती में निहाँ है यहाँ मैं तू नहीं आये चलेगा ज़ुबाँ दिल की ज़रूरी है सुखन को भले उर्दू नहीं आये चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हम सोचे काहे ये सुन्दर सिरजन काट रहे हैं वे बोले हम केक नाम का व्यंजन काट रहे हैं।। दीप जलाने वाले वारिस बुझा रहें कंदीलें पहले जीवन जीते थे अब जीवन काट रहे हैं।। साहनी
 गो समझाते दिल की बातें। किसे बताते दिल की बातें।। उम्र लगी है इन होठों पर आते आते दिल की बातें।। काश कभी हम उस नादां को समझा पाते दिल की बातें।। क्या फागुन समझा पायेगा जाते जाते दिल की बातें।। है सुरेश पागल कह देगा गाते गाते दिल की बातें।। सुरेश साहनी कानपुर
 क्या कभी मैं भी इतना अच्छा था। या तुम्हारी नज़र का धोखा था।। इसमें रुसवाईयाँ हैं ग़म भी है सच बताना कभी ये सोचा था।।साहनी
 क्यों भटकता तेरी राहों में रहूं। गिर के क्यों ख़ुद की निगाहों में रहूं।।  क्यों फिरूँ गलियों में तेरी बावला क्यों न अपनी ही पनाहों में रहूं।।साहनी
 वो हमारे सनम नहीं थे जब क्या नहीं था कि हम नहीं थे जब उस ख़ुदा का कहाँ ठिकाना था इतने दैरोहरम नहीं थे जब।। तब वो जन्नत ज़मीन पर थी क्या पंथ मज़हब धरम नहीं थे जब।। पीने वाले कहाँ थे दुनिया में तब सुराही के खम नहीं थे जब।। इश्क़ होगा ये मान लें कैसे तेरी दुनिया में ग़म नहीं थे जब।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 यूँ भी आतिश पनाह होना है। एक दिन सब तबाह होना है।। हुस्न काजल की कोठरी ठहरा साफ दामन सियाह होना है।। क्या करेगा निगाह शाइस्ता क्या तुझे बदनिगाह होना है।। अब नवाजा है मेरे मुर्शिद ने घर मिरा ख़ानक़ाह होना है।। जिस के सिर पर हो हाथ संजर का एकदिन उसको शाह होना है।। आशिक़ी और फिर ग़ज़लगोई साहनी को तबाह होना है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 गली घर द्वार में उलझा हुआ हूँ। अभी परिवार में उलझा हुआ हूँ।। ये जीवन नून लकड़ी तेल है क्या जहाँ बेकार में उलझा हुआ हूँ।। किसी को जीत कर भी क्या करूँगा मैं अपनी हार में उलझा हुआ हूँ।। बहुत सुंदर है ये मलमूत्र का घर इसी आगार में उलझा हुआ हूँ।। निकल पाता तो मिलता मृत्यु से भी अभी दस द्वार में उलझा हुआ हूँ।। न आएगी सुबह मधुयामिनी की अभी अभिसार में उलझा हुआ हूँ।।
 नये कपड़े पहन कर बदगुमानी कम अज़ कम उठ के मिलना चाहिए था।।   चला है चार कंधों पर अकड़ कर जिसे ख़ुद झुक के चलना चाहिये था।।
 क्या वो इस तरह परेशान करेगा मुझको। प्यार करने को कहेगा न करेगा मुझको।। देख लेगा भी तो कतरा के निकल जायेगा अजनबी बन के वो हैरान करेगा मुझको।।साहनी
 गान्धी तुम्हे ज़रूरत क्या थी ऐसी धरती पर आने की सत्य अहिंसा दया क्षमा सब हों अक्षम्य अपराध जहाँ पर पर तुम भी अहमक़ थे शायद उन अंग्रेजों से लड़ बैठे जो तुमको आदर देते थे और लड़े भी किनकी ख़ातिर उनकी ख़ातिर समझ गए ना?
 जिसको सुनने की साध रही जिसकी लालसा अगाध रही वह बात नहीं तुम कह पाये  वह बात कहाँ हम सुन पाये।। ऐ काश कभी हम चल पाते उस पथ पर जिस पर चल न सके मिलने की चाह लिए बिछुड़े ऐसे बिछुड़े फिर मिल न सके तुमने थामी विपरीत डगर हम भी भटके दूजे पथ पर किंचित इसकी थी यही नियति कब कुसुम टूट कर खिल पाये दो कदम चले हम  साथ साथ पर जग को साथ नहीं भाया जाने क्यों अपनों को अपना हाथों में हाथ नहीं भाया सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आज के दिन थप्पड़ मत मारो बाबूजी। मजदूरों का हक़  मत मारो बाबूजी ।। आप ने बोला था झण्डा फहराना है साथ में अपने कुछ लोगों को लाना है आपकी जय का नारा भी लगवाना है जैसा कहा किया स्वीकारो बाबू जी।। आज के..... आपने बोला था तुमको खर्चा देंगे चाय समोसा दो दो सौ रुपया देंगे आने जाने का सबको भाड़ा देंगे मरे हुओं का हक मत मारो बाबू जी।।आज के...... सुबह के भूखे हैं हम दम से बेदम हैं आपने चांपा मेवा मिसरी चमचम है अपने भी नन्हे बच्चे हैं मैडम हैं घर जाने लायक दे डारो बाबूजी।। आज के... सुरेशसाहनी
 वेदने अब मौन रहना सीख लो हैं कुटिल खूंखार अब संवेदनायें क्या करोगे कौन सुनता हैं व्यथायें सब हँसेंगे जोड़कर अथ वा तथायें लाख तुम निर्दोष या निश्छल रहोगे लोग गढ़ लेंगे कई कुत्सित कथायें चुप न हो बस कुछ न कहना सीख लो अब नहीं सुनती बधिर आत्मीयतायें....... दर्द बांटेगा कोई यह भूल जाओ हर व्यथा हर पीर को उर में छिपाओ बाँटने से पीर बँटती भी नहीं है व्यर्थ अपने आँसुओं को मत लुटाओ प्रेम में चुपचाप दहना सीख लो फिर नहीं मिलनी हैं ये वन वीथिकाएँ ...... .देख क्या अल्हड़ नदी की आज गति है पञ्च कुल्या बन के बंटना ही प्रगति है उम्र ढलती जा रही है आत्ममुग्धे कर वरण अब सिंधु खारा ही नियति है सोच मत वे छिछले सर जो छली थे कर्म परिणति थी वे सड़ कर सूख जायें.......
 यूँ तो ख़्वाबो-ख़याल में थी कल। फिर न जाने कहाँ गयी वो ग़ज़ल।। मरमरी मरमरी थे शेर उसके वो ग़ज़ल थी कि कोई ताजमहल।।साहनी
 तुम क्या क्या अन्जाम बताते फिरते हो रावण को भी राम बताते फिरते हो उल्फत के परिणाम बताते फिरते हो तुम किनको नाकाम बताते फिरते हो भोले हो तुम सचमुच दिल के मसलों में हर छलिया को श्याम बताते फिरते हो दुनिया उनके अफसाने दोहराती है तुम जिनको बदनाम बताते फिरते हो ये लम्पट जो गरज रहे क्या बरसेंगे क्यों हर घन घनश्याम बताते फिरते हो तुम अमीर हो बेशक़ हुस्न की दौलत से इश्क़ मगर क्यों आम बताते फिरते हो कुछ सुरेश समझो नाहक़ मधुशाला को नङ्गों का हम्माम बताते फिरते हो सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हमने दुश्वारियों के हल खोजे उसने अपने सुनहरे कल खोजे।। इश्क़ तो झोंपड़ी में भी खुश है हुस्न बेशक़ बड़े महल खोजे।। उस क़यामत के मुन्तज़िर हैं हम खोजना है जिसे अज़ल खोजे।। हम निबाहेंगे खार से बेशक़ वो कोई गुल कोई कंवल खोजे।। आशिक़ी साहनी से मुश्किल है काम कह दो कोई सरल खोजे।। साहनी सुरेश कानपुर 9451545132
 दिल लगाने की तमन्ना रह गयी। उसको पाने की तमन्ना रह गयी।। प्यार का जो कोष उसके पास था उस खज़ाने की तमन्ना रह गयी ।। जीतना तो प्यार की फितरत नहीं हार जाने की तमन्ना रह गयी ।। जो ग़ज़ल उस पर कही थी इक दफा वो सुनाने  की तमन्ना रह गयी ।। संग  बीते वो न होती ज़िन्दगी पर बिताने  की तमन्ना रह गयी ।। ज़िन्दगी जलसा समझ कर साहनी थी मनाने  की तमन्ना रह गयी ।। साहनी सुरेश, कानपुर 9451545132
 चाहे जिस पाली में रखना। मुझको रखवाली में रखना।। खीर भले घर भर को बांटो प्यार मेरी थाली में रखना।।
 अब न रोयेंगे सिसकियाँ लेकर। ख़ूब जीयेंगे मस्तियाँ लेकर।। क्या किसी का निशान रहना है क्यों जियों हम निशानियाँ लेकर।। खाक़ दिल के करीब पहुँचेंगे हम दिमागों में दूरियाँ लेकर।। ग़म के दरियाब पार करने हैं वो भी कागज़ की कश्तियाँ लेकर।। इस ख़राबा में शोर कैसा हैं हम चले थे खमोशियाँ लेकर।। अब नशेमन नहीं तो डर कैसा लाख आयें वो बिजलियाँ लेकर।। ये दिये साहनी ने बाले हैं शौक़ से आओ आँधियाँ लेकर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आज दुश्वार मैं लगा मुझको। यूँ गुनहगार मैं लगा मुझको।। दुश्मने-जान किसको ठहराऊं क्या कभी यार मैं लगा मुझको।। उसके एजाज में ग़ज़लगोई करके कुफ़्फ़ार मैं लगा मुझको।। सरनिगूँ था मैं आपके दर पर कब परस्तार  मैं लगा मुझको।। ग़ैर अपने भले लगे न लगे और अग्यार मैं लगा मुझको।। ऐ अनारो तुझे भले न लगे तेरा बीमार मैं लगा मुझको।। साहनी की ग़ज़ल अरे तौबा सच मे बेकार मैं लगा मुझको।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 प्रीति का नवगीत अर्पित मन तुम्हें मनमीत अर्पित हार कर सर्वस्व अपना कर रहा हूँ जीत अर्पित।। नभ ने अगणित तारकों से थाल पूजा के सजाये और बंदनवार कितने ऋतु ने उपवन में बनाये पंक्तिबद्धित स्वागतम हित रस्म अर्पित रीत अर्पित।।........ नभचरिय समवेत कलरव मंत्र मोहित कर रहा मन केलि कलियों से भ्रमर दल का पुलकित कर रहा तन ताल स्पंदन हृदय सह स्वास का संगीत अर्पित।।..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 उनकी सत्ता की रखवाली करनी है। हमको अपनी पॉकेट खाली करनी है।। हमको अपना धर्म बचाये रखना है तुमको मज़हब की रखवाली करनी है।। नामुमकिन है ग़ुरबत में इक अपना घर  फिर भी तुमको ख़्वाबख़्याली करनी है।। तुम सुरेश शायर हो कैसे सोच लिया अपूर्ण
 हम तुमपे माइल हो जायें चलता है। दिल से हम घायल हो जायें चलता है।। तुम पर तो है महफ़िल की ज़िम्मेदारी हम बेशक़ पागल हो जायें चलता है।। तुम बहकोगी सारा आलम डोलेगा अपना क्या बेकल हो जायें चलता है।। अपूर्ण
 वसन ऊजरे पहने तन पर मन के काले लोग। अंदर से शातिर पर दिखते भोले भाले  लोग।। चरण चाटते क्रांति के नारे देते मिलते हैं ऊँट की चोरी निहुरे निहुरे करने वाले लोग।। सुरेश साहनी, कानपुर
 वो कह रहा था मुझे देवता बनायेगा। कहाँ पता था मेरे नाम से कमाएगा।। वो मानता है मुझे मेरी मानता कब है बहुत करेगा मेरा नाम बेच  खायेगा।।साहनी