बरसे कम्बल भीजे पानी पढ़ते हो।
क्यों कबीर की उल्टी बानी पढ़ते हो।।
कौन हुआ है पंडित ढाई आखर से
क्यों तुम ऐसी गलत बयानी पढ़ते हो।।
मगहर भेजे ही जाओगे काशी से
नाहक़ साखी सबद रमानी पढ़ते हो।।
सबहिं नचावत राम गुसाईं मालुम है
फिर भी भोला अवढर दानी पढ़ते हो।।
कुछ तो हटकर था कबीर में जिस से तुम
उस अनपढ़ को होकर ज्ञानी पढ़ते हो।।
अम्मा के जीते जी आंगन बाँट लिया
आख़िर कैसी रामकहानी पढ़ते हो।।
तुम सुरेश अपने अन्दर कब झांकोगे
औरों की तो कारस्तानी पढ़ते हो।।
सुरेश साहनी कानपुर
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