इश्क़ है इश्क़ दिल्लगी से अलग
इश्क़ है आम ज़िन्दगी से अलग
इश्क़ से हर किसी को नफ़रत है
इश्क़ रहता है हर किसी से अलग
इब्ने-इब्लीस तो नहीं आशिक़
कुछ तो है इसमें आदमी से अलग
जाति वाले भी फ़र्क़ रखते हैं
इश्क़ है हर बिरादरी से अलग
शेख़ क्या कुफ़्र है मुहब्बत में
इश्क़ में क्या है बन्दगी से अलग
साहनी छोड़ दे कलम या फिर
इश्क़ को कर दे शायरी से अलग
साहनी सुरेश, कानपुर
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