ढूँढने अक्सर हमें जाते हैं हम।
हम नहीं मिलते तो घबराते हैं हम।।
जब नहीं मिलते ज़हाँ की भीड़ में
लौट कर तन्हा चले आते हैं हम।।
क्या जिसे दैरोहरम में खोजते
मयकदे में रूबरू पाते हैं हम।।
अब भी दिल करता है तेरी आरज़ू
अब भी अपने दिल को समझाते हैं हम।।
टूटता है अब भी जब तारा कोई
तब दुआओं में तुझे लाते हैं हम।।
साहनी के ख़्वाब कब के लुट चुके
क्या तुम्हारे ख़्वाब में आते हैं हम।।
सुरेश साहनी अदीब
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