तुम्हें मैं और कितना याद रखता।

कहाँ तक ज़िन्दगी नाशाद रखता।।


ज़हाँ की हर ख़ुशी है तुमको हासिल

तुम्हारे ग़म कहाँ आबाद रखता।।


बुते-काफ़िर पिघल जाते यक़ीनन

जो मैं जाकर वहाँ फ़रयाद रखता।।


कफ़स के हक़ नहीं मानी वगरना

तुम्हारा नाम मैं सय्याद रखता।।


जो अज़मत इश्क़ की मालूम होती

तो हरगिज़ हुस्न को बुनियाद रखता।।


सुरेश साहनी, कानपुर

9451545132

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