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Showing posts from March, 2026
 तेरे भी माँ बाप सोचते यदि कुछ ऐसा  क्या तब तू इस दुनिया में आ पाया होता
 जो दमे-इश्क़ भर रहा होगा। कोई अहले-जिगर रहा होगा।। हुस्न बेशक़ उधर रहा होगा। आईना सज सँवर रहा होगा।। राहे-मक़तल चुनी है उल्फ़त ने मौत से खाक़ डर रहा होगा।। यार जैसा जलाल नामुमकिन लाख शम्सो-क़मर रहा होगा।। यूँ कभी हिचकियाँ नहीं आती वो मुझे याद कर रहा होगा।। हम ग़मे-हिज़्र से परीशां हूँ क्या उसे भी अखर रहा होगा।। दिल चुरा ले गया सरेमहफिल उसमें कितना हुनर रहा होगा।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 फिर से वही नादानियाँ करने लगे हैं हम। कुछ भी हो बदगुमानियाँ करने लगे हैं हम।। यूँ बन सँवर के घूमना आईने ढूंढना अपनी ही निगेहबानियाँ  करने लगे हैं हम।।
 क्या हुआ होश में हम जो आने लगे। फिर से अपने कदम डगमगाने लगे।। ठौर भी उस गली के ठिकाने लगे। आशिक़ी तेरे करतब सुहाने लगे।। दिल हमारा था जिसने भी चोरी किया क्यों नज़र हम उसी से चुराने लगे।। कुछ जुनूँ कोई वहशत दिखी क्या कभी फिर कहाँ से उसे हम दीवाने लगे।।
 दिल की दुनिया जवान है अब भी। हौसलों में उड़ान है अब भी।। और ताबीर क्यों नहीं होंन्गे उसके ख़्वाबों में जान है अब भी।। दर्द तेरे न दर-ब-दर  होंगे जिस्म अपना मकान है अब भी।। हुस्न की शोखियाँ अज़ल से हैं इश्क़ शीरी ज़ुबान है अब भी।। फिर वहां हम नहीं गये लेकिन दर्दे-दिल की दुकान है  अब भी।। लग रहा जान लेके मानोगे क्या कोई इम्तिहान है अब भी।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 वक़्त के साथ ढल न जाओगे। कैसे मानें  बदल  न जाओगे।। ख़ाक़ सम्हलोगे जो गिरोगे नहीं गिर गये तो सम्हल न जाओगे।। वक़्त की चाल लाख धीमी हो उससे आगे निकल न जाओगे।। जा न पाओगे इश्क़ के घर मे जो वहाँ सिर के बल न जाओगे।। हम यूँ जलवानुमा नहीं होंगे कैसे माने मचल न जाओगे।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 कश्ती में हलचल हो जाये। आओ एक ग़ज़ल हो जाये।। इश्क़ सरापा नूरानी हो हुस्न ज़रा श्यामल हो जाये।। बाहों को पतवार बना लें बेशक़ जग जलथल हो जाये।। मन घट प्रणयामृत से भर लो भव पथ सुगम सरल हो जाये।। उठें हिलोरें  फिर संगम की तन शुचि मन निर्मल हो जायें।। कौन क़यामत तक रुकता है बेहतर है इस पल हो जाये।। आज सुरेश मिला है मिल लो ख़ूब सुना है कल हो जाये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ज़िन्दगी के विराम तक पहुँचे। अन्ततः हम मक़ाम तक पहुंचे।। इक तिरा दर नहीं मिला अब तक जबकि हम गाम गाम तक पहुंचे।। जब तअल्लुक़ ही तर्क है उनसे कोई कैसे सलाम तक पहुँचे।। उस ख़ुदा के ही इंतज़ाम हैं सब आप किस इंतज़ाम तक पहुँचे।। हौसले से उछालिये पत्थर बात कुछ तो निज़ाम तक पहुँचे।। दे रहा है वो विष ज़माने के कोई मीरा न श्याम तक पहुँचे।। बेख़ुदी तक वली पहुंचते हैं शेख भी सिर्फ़ जाम तक पहुँचे।। काश मजमून भांपते दिल का आप बस जिस्मे-खाम तक पहुँचे।। @highlight  सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ख़ुद को खुलकर किताब करना है। याने सबका हिसाब करना है।। हुस्न है क़ाबिले गुरुर सही इश्क़ भी लाजवाब करना है।।
 मेरे दो सहकर्मी आपसी बातचीत में मशगूल थे। उनके चेहरे बता रहे थे कि वे दोनों किसी गम्भीर चर्चा में निमग्न हैं। इस बीच मैं उनके नज़दीक पहुंच चुका था। स्वभावतः मैंने पूछ लिया क्या बातें चल रही हैं भाई!क्या शेयर बाज़ार से जुड़ी बात है?  मित्र ने जवाब दिया," ऐसा कुछ नहीं भैया ! बस उज्ज्वल भाई कह रहे हैं कि ड्रम से बहुत डर लगता है। और यह बात मैं भी मानता हूँ!   मैंने उत्सुकता वश पूछा," ऐसा क्यों?   मित्र ने बड़े गम्भीर और शांत स्वर में कहा," भैयाजी! 16 टुकड़े ड्रम में ही मिले थे। और मेरे घर में तो दो ड्रम हैं।'     जाने क्यों मैं भी उनके भय से सहमत लगा।खैर!!!! अभी कल की बात है । मेरे मित्र सुकुल जी बता रहे थे कि यार गेहूँ कटाई का सीजन आ रहा है।और पण्डिताइन  दो ड्रम खरीदने का फरमान जारी करी हैं।  और तुम्ही  दिलाओगे। हास्य व्यंग्य
 अपने दिल की भी क्यों कही न करें। क्या करें हम जो आशिक़ी न करें।।  उज़्र था उनको तीरगी से कभी अब वो चाहें हैं रोशनी न करें।। मर्ज़े-उल्फ़त से है शिकायत भी फिर कहे हो इलाज भी न करें।। इश्क़ भी बेख़ुदी में कर गुज़रे होश  वाले तो ये कभी न करें।। फिर ये आदाब भी ज़रूरी हैं ये ग़लत है कि हम सही न करें।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 मैंने एनसीआर में अधिवास करने वाले एक कवि साथी से चर्चा की। मेरी इच्छा थी कि भारत की साहित्यिक राजधानी में एक काव्य कलरव कार्यक्रम का आयोजन  किया जाय। किसी शुभेच्छु ने सुझाव दिया था कि इस क्रम में दो एक गिद्ध भी मंच पर शोभायमान होंगे तो कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ जाएगी। मैंने इसी लिए अपने दिल्ली प्रवास के दौरान उन साथी को  फोन मिलाया। लेकिन उनसे संवाद के पश्चात मैं जैसे भकुआ गया।  उन्होंने पूछा किसको किसको अपने मंच पर बुलाना चाहते हैं?   मैंने उनसे काव्य जगत के अम्बानी जी को अपनी वरीयता सूची में प्रथम स्थान पर बिठा रखा था सो उनका ही नाम ले लिया।   साथी कवि ने बड़ी सहजता से बोला, 'बीस लाख प्लस जीएसटी,।  मैंने कहा , कुछ कम मूल्य में दयावान कवियों के नाम बताइए।' देखिए आपको अच्छा कार्यक्रम कराना है कि कविता करवानी है। अगर अच्छा कार्यक्रम करवाना है तो लगभग तीस लाख की व्यवस्था कर लीजिये। वरना आप से अच्छा कवि कौन है! अपने जैसे दस कवि बुला लीजिये।कार्यक्रम हो जायेगा।  मैंने कहा कि भाई आप ही आ जाइयेगा। उन्होंने कहा कि,' डेढ़ लाख दे दीजिएगा। मैं भी आ जाऊँग...
 मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है। या तहरी के साथ रसीली सी तरकारी है।। इसमें कन्या भ्रूण बचाने वाली लाइन है कन्या को भरपूर पढ़ाने वाली लाइन है मेरी  कविता पूरी तरह दहेज विरोधी है इसमें नारी हक़ दिलवाने वाली लाइन है इस कविता में सकल सृष्टि की रक्षक नारी है।..... मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है।।...... मैंने इस कविता में वन रक्षण पर बोला है वन जीवों पर गौरेया संरक्षण पर बोला है पर्वत नदियां हिमनदियों और जंगल की रक्षा सकल धरा पर बढ़ते परदूषण पर बोला है मेरी कविता मंचों की पूरी अधिकारी  है।। मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है।।...... इस कविता में सभी तरह के मिर्च मसाले हैं इसमें ओज देशभक्ति के तड़के डाले हैं इसमें पाकिस्तान को हमने धमकी भी दी है और चीन को विश्व शान्ति के मैसेज डाले हैं मेरी कविता रंग बिरंगी सबसे न्यारी है।। मेरी कविता बड़ी चटपटी और करारी है।।...... हास्य व्यंग्य सुरेश साहनी, कानपुर
 यूँ कवियों की भीड़ बहुत है  महफ़िल महफ़िल किंतु वास्तविक कवि हैं कितने कहना मुश्किल श्रोता भी अब कहाँ किसी को जाँच रहे हैं उधर सबल जी किसी सरल को बाँच रहे हैं कोई झंझट कोई करपट कोई बेदिल कविता का दिल तोड़ रहे हैं सारे हिलमिल..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132  हास्य व्यंग्य
 कभी कभी ऐसी ऐसी फ्रेंड रिक्वेस्ट आती है कि मन तीन चार दशक पीछे की ओर ऐसे भागने लगता है जैसे कि कउनो जवान बछरू कुलांच मारै। मन का मयूर कहरौवा नाच नाचने लगता है।अब एहिमा हँसने की क्या बात है! कउनो हम बुढा गये हैं क्या?   खैर  यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है।जब बड़े बड़े ऋषि मुनि डोल जाते हैं तो हमारे जैसे आम की क्या बिसात कि चैत फागुन में ना बौराये।एक बार बढ़िया तो लगा। देखा कि हमारे कई विभागीय सन्तजन भी उनकी मित्र सूची में शामिल हैं। सो उनकी फिरेन्ड रिकवेस्ट स्वीकार करने के कई आधार बन रहे थे। और कवियों के बारे में यूँ कहाँ गया है कि ,"सुवरण को खोजत फिरत कवि,व्यभिचारी, चोर।।'  फिर भी जैसा कि अपनी पुरानी आदत है कि सोशल मीडिया पर हम    सोच विचार जाँच पड़ताल के बाद ही मित्र बनाते हैं।सो प्रोफाइल देखा। अब क्या बताये इतनी सुंदरता देखने के बाद बुद्धि तो जैसे घास चरने चली गयी। कुछ देर बाद जब लौटी तो देखा मैदान उतना साफ नहीं है।कई और जाने पहचाने जनावर पहले से चरन्त मुद्रा में उपस्थित हैं।अतः उत्साह थोड़ा सा तो ठण्डा हुआ।लेकिन दिल तो पागल है ना सो ठीक कैसे हो एकता है। ख़ै...
 प्रेम में पड़कर क्या खोना क्या पाना था बस तुमको मैं मुझको तुम हो जाना था हँस पड़ता हूँ जब वो दिन याद आते हैं तुम  नादां तो थी    मैं भी दीवाना था सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 वो हसीं रात फिर कभी न हुयी। आपसे बात फिर कभी न हुयी।। साथ बारिश में भीगना तय था यूँ के बरसात फिर कभी न हुयी।।
 चुप रहो इक मुकम्मल ग़ज़ल बन सके प्यार का ख़ूबसूरत महल बन सके ताज तैयार होने तलक चुप रहो।। चुप रहो प्यार होने तलक चुप रहो।।साहनी
 क्या तआरुफ़ है मेरा भूल गए। बाखुदा हम तो ख़ुदा भूल गए।। एक बस तेरी गली याद रही और हम अपना पता भूल गए।। तुझको मालूम नहीं है ये अदा क्या नहीं तेरे सिवा भूल गए।। इसमें हैरत की कोई बात नहीं तुम अगर तर्ज़े-वफ़ा भूल गए।।
 क्या ज़रूरी है ओहदे पर हो। तुम किसी हाल में मोहतबर हो।। प्यार रिश्तों में हो ज़रूरी है फिर महल हो कि फूस का घर हो  ।। चाँद तारों की क्या ज़रूरत है जीस्त जब प्यार से मुनव्वर हो।। हम हैं उल्फत के आस्ताने से कोई बेशक़ बड़ा सिकन्दर हो।। साहनी कौन जानता है तुम्हें अब न कहना कि तुम सुख़नवर हो।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 प्रेम सौंदर्य की अर्चना कर सके नैन नत हो प्रणय याचना कर सके  रूप रतनार होने तलक चुप रहो।। चुप रहो प्यार होने तलक चुप रहो।।
 यदि जनता के साथ चलें तो सरकारों का गिरना तय है आज मशीनों का बहुमत है जनता का मत क्या मतलब है सब कुछ पूँजी से होना है सब हों सहमत क्या मतलब है सत्ता की ताकत को समझो हर विरोध का मरना तय है तुम  करते थे चोरी थी जो हम करते है  अब विकास है आओ साथ नहा लो गंगा उन्नति का ग्लोबल प्रयास है हरिश्चन्द्र अब क्या कर लेंगे रोहिताश्व का मरना तय है..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हमें हम छोड़कर बढ़ने लगे हैं। कई इस बात से कुढ़ने लगे हैं।। बहुत पछताए उन पर कहके गज़लें हमी सुनने हमीं पढ़ने  लगे हैं।। लगे है जा चुका है दौर अपना हमें सब फ्रेम में जड़ने लगे हैं।।  ये डर है बदगुमां करदे न शोहरत हवा में कुछ तो हम उड़ने लगे हैं।। कभी था साहनी भी एक शायर मगर अब सब उसे पढ़ने लगे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 कब न थे कब थे हमारी ज़िन्दगी के मायने। आप कब समझे हमारी किस खुशी के मायने।। मेरे जीते जी न समझा जो हमारे दर्द को क्या समझता फिर हमारी खुदकुशी के मायने।। हुस्न वालों को पता है हुस्न की रांनाईयाँ इश्क़ वाले जानते हैं आशिक़ी के मायने।। जिस ख़ुदा की राह में मरता रहा है आदमी क्या पता है उस ख़ुदा को बन्दगी के मायने।। हम से बेपर्दा हुआ जो क़ुर्बतों के नाम पर वो हमें समझा रहा है पर्दगी के मायने।। जो चरागों को बुझाने में हवा के साथ थे क्या  बतायेंगे हमें वो रोशनी के मायने।। कितनी दरियाओं का पानी पी रहा है रात दिन इक समन्दर को पता है तिश्नगी के मायने।। सुरेश साहनी, कानपुर
 और जाते भी तो कहाँ आख़िर। छोड़ कर क़ू-ए-जाने-जां आख़िर।। हम गदायी हुये तो हैरत क्यों कैसे बेहतर है लामकां आख़िर।।
 किस वफ़ा की तलाश है तुमको क्या ख़ुदा  की तलाश है तुमको।। इश्क़ तुमको हुआ यकीन नहीं जब अना की तलाश है तुमको।। जिसको सुन कर वो लौट सकता था उस सदा की तलाश है तुमको।। कुछ तो सपनों से ख़ुद को दूर करो क्या हवा की तलाश है तुमको।। सुरेश साहनी कानपुर