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 हम थे यूँ भी ग़रीब क्या जीते। दूसरों का नसीब क्या जीते।। दूर रहकर अजाब देता है उसके होकर क़रीब क्या जीते।।साहनी
 तुम को ख़ुद पर यक़ीन है या फिर। शक की कोई ज़मीन है या फिर।। ज़िन्दगी तू तो ख़ूबसूरत है मौत भी कुछ हसीन है या फिर।। तुम भी फुफकारने लगे मुझ पर ये मेरी आस्तीन है या फिर।। क्यों नहीं रोकता गुनाहों को पास उसके भी बीन है या फिर।। दर्द की कैफियत बताती है इश्क़ ताज़ातरीन है या फिर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132