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Showing posts from July, 2026
 सुनो हम तुम्हें पढ़ाना चाहते हैं नहीं किताब कॉपी  वाली पढ़ाई नहीं उस पढ़ाई से  तुम बिगड़ चुके हो क्योंकि जब तुम कहते हो ,  तुम्हें मानव मात्र से प्यार है तो दुख होता है कि कैसे सीख गए तुम प्यार करना आख़िर हम जहां रहते हैं वहां प्रेम अपराध ही तो है तो हम तुम्हें पढ़ाएंगे कि कैसे की जाती है नफरत कैसे हो सकता है एक धर्म  दूसरे धर्म का का सनातन शत्रु कैसे कर सकते हो सफल घृणा  उनके प्रति जिन्होंने हेरोदस की संतानों को सदियों तक दबाकर रखा  और कैसे नहीं मिला हेलेना को राजमाता का पद  अगली दस पीढ़ी तक तुम्हें आने चाहिए नफरतों के गुणा भाग पता होना चाहिए नफरतों का इतिहास भूगोल और पता होना चाहिए कि तुम्हारे माता पिता तुम्हारी ज़िन्दगी बिगाड़ रहें हैं पढा लिखा कर उस एक डिग्री के लिए जिसके बगैर भी तुम जी सकते हो ज़िन्दगी और कर सकते हो  नफरत जितनी चाहे उतनी वह नफरत जो सनातन है नफरत करने के लिए  पढ़ना  ज़रूरी नहीं जबकि प्रेम के लिए ढाई अक्षर पढ़ना पहली शर्त है।। सुरेश साहनी, कानपुर #highlight
 भावों में शुचिता रखते तो प्रेम हमारा पावन होता अक्षुण्ण होती नेह वर्तिका सतसम्बन्ध सनातन होता
 दूर रहते हुये ही मिल लेना। कुछ झिझकते हुए ही मिल लेना।  दिन निकलते हुये ही मिल लेना। शाम ढलते हुये ही मिल लेना।। तुमसे करने हैं कुछ सवाल मुझे नफ़्स रहते हुये ही मिल लेना।। मिल न पाये उरूज़ के दौरान ख़ैर ढलते  हुये ही मिल लेना।। रात तुम नींद से रहे बोझिल आँख मलते हुए ही मिल लेना।। रुक के शायद कभी न मिल पाओ तुम टहलते हुये ही मिल लेना।। वस्लो-फुरक़त कि अब किसे परवाह पर न मिलते हुये ही मिल लेना।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 क्या कहा हम भी  यार थे  उनके सब तो उम्मीदवार थे उनके हम भी थे हुस्न के असीरों में पर न बीमार- वार थे उनके एक हम आशना रहे तो क्या  यूँ तो आशिक़ हज़ार थे उनके ख़ूब चर्चे थे दौरे कालेज में हर तरफ़ इश्तेहार थे उनके हुस्न तो बेपनाह था उन पर हर तरफ जाँनिसार थे उनके तब खिज़ां का उन्हें ख़याल न था क्या गुमाने-बहार थे उनके आज कतरा रहे हो मिलने से कल बड़े ग़मगुसार थे उनके सुरेश साहनी कानपुर  9451545132
 यारों की कमज़र्फ़ी है तस्लीम मगर दुश्मन हो ख़ुद्दार हमेशा ध्यान रहे।।साहनी
 कैसे कह दें कि हम रहे तन्हा कौन मानेगा ग़म रहे तन्हा हम थे मज़लूम भीड़ का हिस्सा वो थे करके सितम रहे तन्हा जो थे अहले यक़ीन साथ रहे सिर्फ़ अहले-वहम रहे तन्हा भीड़ के बाद भी न जाने क्यों पत्थरों के सनम रहे तन्हा मयकदे में हमें सुकून तो है कौन जाकर अदम रहे तन्हा सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 बेशक़ है दिल्ली रजधानी है अपनी फिर भी अनजानी वैसे बहुतेरे अपने है फिर क्यों है इतनी बेगानी रोज कथा घर एक बसा कर रोज उजड़ती एक कहानी यहाँ झोंपड़ी पर चलती है हवसी महलों की मनमानी बचना इन नादिरशाहों से ठहरा देंगे पाकिस्तानी फिर फिर दिल्ली क्यों आता है यह सुरेश करने नादानी.
 तन से बाहर तो निकालें ख़ुद को और आईना बना लें ख़ुद को गर्द जो तन पे है धूल जायेगी क्यों ना अन्दर से खंगालें ख़ुद को साहनी
 फागुनी अंगड़ाईयों के दिन गये सावनी पुरवाईयों के दिन गये अब कहाँ वो मस्तियाँ मदहोशियां बेवज़ह रुसवाईयों के दिन गये फाग कजरी और सोहर गुम हुये गूँजती अंगनायियों के दिन गये तीर नज़रें और मेरा सांवरा हाय उन हरजाईयों के दिन गये आ चुका है यार मेरा वज़्म में साहनी तन्हाइयों के दिन गये
 और किसको मलाल है मुझसे आज मेरा सवाल है मुझसे पाल बैठा हूँ ये ग़लतफ़हमी हर उरुज़ो-,जवाल है मुझसे मेरा होना है वक़्त का होना रात दिन माहो साल है मुझसे ग़म तेरे आज भी  यतीम नहीं दर्द की देखभाल है मुझसे रात भर मैं ही मुझसे उलझा हूँ जिस्म मेरा निढाल है मुझसे मैं ज़माने की लय समझता हूं पर ज़माने की ताल है मुझसे जाने कितने असीर हैं मेरे साहनी तक निहाल है मुझसे सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 स्वयं से युद्ध शिव तक ले चलेगा सदाचर बुद्ध शिव तक ले चलेगा हमारा मन हो शिव संकल्प वाला यही मन शुद्ध शिव तक ले चलेगा अभी तक इंद्रियों के वश में है मन करो अनिरुद्ध शिव तक ले चलेगा तुम्हारा क्रोध शिवता का क्षरण है न होना क्रुद्ध शिव तक ले चलेगा सहजतः योग से मन वृत्तियों को करोगे रुद्ध शिव तक ले चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 मुझे आना था आ पहुंचा यहाँ पर। मुक़द्दर रह गया जाने कहाँ पर।। दुआ थी टूटते तारे से करनी निगाहें थीं तुम्हारी कहकशाँ पर।। ज़मीं पर तुमको रहना तो कहते किसी का घर बना कब आसमां पर।। दराजेगा तुम्हारी उम्र मौला करम तो कर कभी इस नीम-जाँ पर।। किसी सय्याद पर माइल हो शायद तभी तो तोहमतें हैं बाग़वां पर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 वेद कहे भगवान का है अव्यक्त सरूप। ये कहते जो हम कहें पूजो  वह ही रूप।। एक तुम्हारे राम हैं एक हमारे राम। घट घट व्यापी राम पर काहे का संग्राम।। एक शुद्र ने कर लिया हरि का कीरत गान। क्या इतने से हो गये कलिमलीन भगवान।। उस प्रभु की क्या जाति है क्या है उसका धर्म। क्यों लड़ते हैं लोग जब नहीं जानते मर्म।। समदर्शी बन बांटता सर्दी बारिश धूप। और यहां हर जाति के अपने अपने कूप।। आज देश को दीजिये सौ टुकड़ों में तोड़। कल घट कर रह जायेंगे चिन्तक चंद करोड़।। सुरेश साहनी कानपुर
 हम जमीं आसमान हैं गुरुवर हाँ जगत से महान हैं गुरुवर है जगत राग रंग में ग़ाफ़िल नाद अनहद की तान हैं गुरुवर बस अहम मानने नहीं देता किस क़दर ज्ञानवान हैं गुरुवर ब्रम्ह सम हैं कि गुरु स्वयं शिव हैं या जगतपति समान हैं गुरुवर जिनसे विज्ञान भी समादृत है धर्म का वह निशान हैं गुरुवर सुरेश साहनी कानपुर
 चाहते सब हैं हम सुधर जायें पर बताते नहीं किधर जायें कुछ का मन है कि हम उधर जायें आप कहते हैं हम इधर जायें क्या युवाओं का है कोई साहिल या कि दरिया में हम उतर जायें पाँव लटके हैं कब्र में उनके किसलिए नौनिहाल मर जायें मंज़िलें चल पड़ी हैं सिम्ते-सफ़र  हम कहाँ  किस तरह ठहर जायें सुरेश साहनी, कानपुर
 हर इक महरम की आदत हो गयी है। कि उसके  ग़म की आदत हो गयी है।। मिरे इस हाल पर हैरां न होना दरे-बरहम की आदत हो गयी है।। मिरी बदहालियों पर तंज करना अभी आलम की आदत हो गयी है।। मुहब्बत अशरफों में ढूँढता है उसे खातम की आदत हो गयी है।। उलझ कर रह गयी है जैसे हौव्वा यही आदम की आदत हो गयी है।। महरम/उपेक्षा,प्रतिबंधित संज्ञायें बरहम/अस्त व्यस्त, परेशान,कुद्ध आलम/संसार, स्थिति अशरफ/श्रेष्ठ, ऊँचे लोग खातम/ मुहर, ठप्पा या श्रेष्ठ चिन्ह सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 माननीय सांसद महोदय बेलांव घाट टोल प्लाजा के दोहरे हत्याकाण्ड केस में एमपी एमएलए कोर्ट से बाइज्जत बरी किये। इसे न्यायिक प्रविधि का दोष ही कहेंगे कि ऐसे सज्जन जनप्रतिनिधि को अनवरत पन्द्रह वर्ष तक आरोपी के रूप में नाना प्रकार के संताप सहने पड़े।उन्हें हत्यारा क्रूर और बाहुबली कह कर अवमानित किया गया। जबकि माननीय इतने विनम्र हैं कि उन्होंने माननीय न्यायालय और न्यायपालिका के प्रति अगाध आस्था रखते हुये कृतज्ञता जताई।  हमें इस बात का गर्व है कि हम उस राज्य के निवासी हैं जहाँ बड़ी मात्रा में ऐसे लोकप्रिय , विनम्र और जुझारू जनसेवक उपलब्ध हैं। ये और बात है कि नकारा जनता ऐसे भले जनप्रतिनिधियों पर बड़ी मात्रा में मुकदमें लाद कर उनकी सेवा की भावना को आहत करती रहती है।   अब तो यह शंका भी बलवती होने लगी है कि वास्तव मे वे हत्यायें हुई भी थीं या नहीं।क्या पता संजय निषाद और नन्दलाल निषाद नामक व्यक्ति  मरे थे कि नहीं। पुलिस को  चाहिये कि वह उपरोक्त संदिग्ध मृतकों को अविलंब गिरफ्तार करे ताकि जनता जनार्दन का न्यायपालिका के प्रति विश्वास दृढ़ हो सके और ऐसे किसी भी माननीय को  ऐसा को...