हम अगर हम से मिल नहीं पाये। तुम भी तो तुम से मिल नहीं पाए।। लज़्ज़ते-ग़म है इश्क़ की ऐसी हम किसी ग़म से मिल नहीं पाये।। हम अना में पहुँच के बामे-अदम यूँ गिरे धम से मिल नहीं पाये।। आशना होके कब मिले तुम भी हम भी हमदम से मिल नहीं पाये।। ताब-ए-तिश्नगी रही इतनी होठ शबनम से मिल नहीं पाये।। इश्क़ की मय तलब में थी लेकिन हुस्न के खम से मिल नहीं पाये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
Posts
Showing posts from May, 2026
- Get link
- X
- Other Apps
नाम से हम फ़क़ीर हैं समझे? धनकुबेरों की पीर हैं समझे।। हमपे लाखों का कर्ज़ है यारों हम बहुत ही अमीर हैं समझे? जितने बदहाल हैं भिखारी हैं सब हमारे असीर हैं समझे? अब है कानून अपनी मुट्ठी में हर तरह हम क़दीर हैं समझे? कौन सा दीन कौन सा मज़हब हम तो ज़र के पज़ीर हैं समझे? असीर/बंधक क़दीर/समर्थ, नियंत्रण करने वाले ज़र/ दौलत पज़ीर/समर्थक, मानने वाले सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
- Get link
- X
- Other Apps
शीशा शीशा पत्थर पत्थर पटकोगे। क्या अपनी ख़ुद्दारी ही धर पटकोगे।। हाथ पसारोगे किस किस के आगे तुम किसकी किसकी ड्योढ़ी पर सर पटकोगे।। गर्द ज़मीं की ले जाओगे अम्बर तक या धरती पर लाकर अम्बर पटकोगे।। कुछ अपनी गलती भी मानोगे या फिर अपनी हर ख़ामी औरों पर पटकोगे।। माना साहब शौचालय बनवा देंगे भूखे पेटों क्या ले जाकर पटकोगे।। पैर पटकना बच्चो को ही भाता है पागल हो क्या बूढ़े होकर पटकोगे।। साँप निकल कर कुर्सी पर जा बैठा है अब क्या लाठी अपने ऊपर पटकोगे।। घर छूटा नौकरी गयी हल बैल बिके बेगारी में कितना जांगर पटकोगे।। सुरेश साहनी, अदीब 9451545132
- Get link
- X
- Other Apps
आज हनुमान जी बड़ी तेजी में जाते दिखाई दिए।पहले मैंने सोचा कि उनको परणाम कर लें।फिर पता नहीं क्या सोचा कि ठिठक गए।मैंने सोचा सुबह सुबह प्रभु कहीं जरूरी काम से जा रहे हैं ,सो टोकना ठीक नहीं।वैसे भी जैसे तुलसी बाबा ने लिखा भी है कि "प्रात लेहि जो नाम हमारा। ता दिन ताहि न मिलै अहारा।।" यदि यही चौपाई हमहूँ पर लागू होती होगी तो हनुमान जी दिन भर भूखे ना रहि जाएं। आखिर तुलसी बाबा ने हमको भी कहाँ छोड़ा है। कायर कपटी कुमति कुजाती। लोक वेद बाहर सब भाँती।। सो हम यह सोच के चुप रह गए। लेकिन अचानक हनुमान जी पीपल के पेड़ के पास जाकर रुक गए।मैंने देखा कि वे अपना मूँज का जनेऊ उतार के पीपल के पेड़ पर टांग रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने जाकर उन्हें प्रणाम किया।वे भी जैसे किसी को ढूंढ ही रहे थे।मुझे देखकर उनके मन मे कनपुरियों के प्रति खराब वाली अवधारणा मिट गई होगी।फिर भी उन्होंने "लंका निसिचर निकर निवासा, वाले अंदाज में पूछ ही लिया - आप? - जी मैं सुरेश साहनी । कवि हूँ। इतना सुनते ही हनुमान जी जाने को उद्यत हो गए। उन्हें लगा होगा कि कहीं ये कविता न सुनाने लग जाये।कविय...
- Get link
- X
- Other Apps
दरहक़ीक़त हमें पहचान रहे हो तो कहो। इक ज़रा सा भी अगर जान रहे हो तो कहो।। तुम कभी दिल मे रहे हो हमें मालूम नहीं ख़्वाब में भी कभी मेहमान रहे हो तो कहो।। आदमी होना बड़ी बात नहीं हम भी हैं दिल से लेकिन कभी इन्सान रहे हो तो कहो।। कल फरिश्ते थे मगर आज हैं इबलीश बहुत अब मलायक कभी शैतान रहे हो तो कहो।। दीन क्या है फ़क़त इन्सान की ख़िदमत करना खूब जाने हो मगर मान रहे हो तो कहो।। सुरेश साहनी, कानपुर 945154532
- Get link
- X
- Other Apps
तुम्हें अपना बताना पड़ रहा है। मरासिम है निभाना पड़ रहा है।। बला से कोई रूठे या न रूठे हमें हम को मनाना पड़ रहा है।। हमें हम याद आये थे बमुश्किल अचानक भूल जाना पड़ रहा है।। तुम्हारे ग़म की दौलत छिन न जाये सहम कर मुस्कुराना पड़ रहा है।। शहर में पूछता है कौन किसको सड़क को गाँव आना पड़ रहा है।। कहाँ से रोशनी लाते वफ़ा की सो अपना दिल जलाना पड़ रहा है।। कभी महसूस होती थी मुहब्बत अभी कह कर जताना पड़ रहा है।। सुरेश साहनी कानपुर
- Get link
- X
- Other Apps
विष्णुपदी तू ही मातु तू ही शिवकेशिनी है तू ही गंगा तू ही मातु भारती है नर्मदे मध्य ही प्रदेश नहीं महाराष्ट्र गुजरात राज्य से भी ख़ुद को गुजारती है नर्मदे विंध्य सतपुड़ा मातु पाके तुझे धन्य हुए शिव विग्रहों को तू पखारती है नर्मदे जाके गुजरात पार म्लेच्छों को तो तारती है सिंधु को भी भव से उबारती है नर्मदे।। शांत रहूँ मातु तेरी तरह प्रशांत रहूँ हर्ष न प्रमाद न विषाद देना नर्मदे। जानता हूँ भली भांति कृपा है असीम तेरी भक्ति भाव उर में अगाध देना नर्मदे।। तू है निर्विवाद जैसे मैं भी निर्विवाद रहूँ जो भी देना मुझे निर्विवाद देना नर्मदे। गंगा पुत्र हूँ मैं आज आया हूँ तेरे समीप मौसी ही की ममता प्रसाद देना नर्मदे।।
- Get link
- X
- Other Apps
जब हमारे ही हम से टूट गए। हम से मजबूत ग़म से टूट गए।। मयकदे के वजू का देख असर रिश्ते दैरो- हरम से टूट गए।। उसका महफ़िल में यूँ अयाँ होना दीन वाले धरम से टूट गए।। फिर तो लज़्ज़त रही न रोज़े की जो सुराही के खम से टूट गए।। इतने नाज़ुक नहीं है हम यारब जो गिरे और धम से टूट गए।। तेरी आँखों को देखकर साक़ी हम हमारी कसम से टूट गए।। आशिक़ी के बहर में उतरे क्यों तुम अगर ज़ेरोबम से टूट गए।। सुरेश साहनी, कानपुर 2021 7 may
- Get link
- X
- Other Apps
क्या कहा हौलनाक है ही नहीं। इस से बढ़कर मज़ाक है ही नहीं।। इश्क़ को इत्तेफ़ाक़ जायज़ है हुस्न को इत्तेफाक है ही नहीं।। हुस्न परदा करे करे ना करे इश्क़ पर झाँक-ताक है ही नहीं।। आशिक़ी क्यों न हो तेरी ख़ारिज तू गिरेबान चाक़ है ही नहीं।। साहनी तुझ को होश है अब तक तू मिरा इश्तियाक़ है ही नहीं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132