तुम्हें अपना बताना पड़ रहा है।

मरासिम है निभाना पड़ रहा है।।


  बला से कोई रूठे या न रूठे

हमें हम को मनाना  पड़ रहा है।।


 हमें हम याद आये थे बमुश्किल

अचानक भूल जाना पड़ रहा है।।


तुम्हारे ग़म की दौलत छिन न जाये

सहम कर मुस्कुराना पड़ रहा है।।


शहर में पूछता है कौन किसको 

सड़क को गाँव आना पड़ रहा है।।


कहाँ से रोशनी लाते वफ़ा की

सो अपना दिल जलाना पड़ रहा है।।


कभी महसूस होती थी मुहब्बत

अभी कह कर जताना पड़ रहा है।।


सुरेश साहनी कानपुर

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