विष्णुपदी तू ही मातु तू ही शिवकेशिनी है
तू ही गंगा तू ही मातु भारती है नर्मदे
मध्य ही प्रदेश नहीं महाराष्ट्र गुजरात
राज्य से भी ख़ुद को गुजारती है नर्मदे
विंध्य सतपुड़ा मातु पाके तुझे धन्य हुए
शिव विग्रहों को तू पखारती है नर्मदे
जाके गुजरात पार म्लेच्छों को तो तारती है
सिंधु को भी भव से उबारती है नर्मदे।।
शांत रहूँ मातु तेरी तरह प्रशांत रहूँ
हर्ष न प्रमाद न विषाद देना नर्मदे।
जानता हूँ भली भांति कृपा है असीम तेरी
भक्ति भाव उर में अगाध देना नर्मदे।।
तू है निर्विवाद जैसे मैं भी निर्विवाद रहूँ
जो भी देना मुझे निर्विवाद देना नर्मदे।
गंगा पुत्र हूँ मैं आज आया हूँ तेरे समीप
मौसी ही की ममता प्रसाद देना नर्मदे।।
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