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 और किसको मलाल है मुझसे आज मेरा सवाल है मुझसे पाल बैठा हूँ ये ग़लतफ़हमी हर उरुज़ो-,जवाल है मुझसे मेरा होना है वक़्त का होना रात दिन माहो साल है मुझसे ग़म तेरे आज भी  यतीम नहीं दर्द की देखभाल है मुझसे रात भर मैं ही मुझसे उलझा हूँ जिस्म मेरा निढाल है मुझसे मैं ज़माने की लय समझता हूं पर ज़माने की ताल है मुझसे जाने कितने असीर हैं मेरे साहनी तक निहाल है मुझसे सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 स्वयं से युद्ध शिव तक ले चलेगा सदाचर बुद्ध शिव तक ले चलेगा हमारा मन हो शिव संकल्प वाला यही मन शुद्ध शिव तक ले चलेगा अभी तक इंद्रियों के वश में है मन करो अनिरुद्ध शिव तक ले चलेगा तुम्हारा क्रोध शिवता का क्षरण है न होना क्रुद्ध शिव तक ले चलेगा सहजतः योग से मन वृत्तियों को करोगे रुद्ध शिव तक ले चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 मुझे आना था आ पहुंचा यहाँ पर। मुक़द्दर रह गया जाने कहाँ पर।। दुआ थी टूटते तारे से करनी निगाहें थीं तुम्हारी कहकशाँ पर।। ज़मीं पर तुमको रहना तो कहते किसी का घर बना कब आसमां पर।। दराजेगा तुम्हारी उम्र मौला करम तो कर कभी इस नीम-जाँ पर।। किसी सय्याद पर माइल हो शायद तभी तो तोहमतें हैं बाग़वां पर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 वेद कहे भगवान का है अव्यक्त सरूप। ये कहते जो हम कहें पूजो  वह ही रूप।। एक तुम्हारे राम हैं एक हमारे राम। घट घट व्यापी राम पर काहे का संग्राम।। एक शुद्र ने कर लिया हरि का कीरत गान। क्या इतने से हो गये कलिमलीन भगवान।। उस प्रभु की क्या जाति है क्या है उसका धर्म। क्यों लड़ते हैं लोग जब नहीं जानते मर्म।। समदर्शी बन बांटता सर्दी बारिश धूप। और यहां हर जाति के अपने अपने कूप।। आज देश को दीजिये सौ टुकड़ों में तोड़। कल घट कर रह जायेंगे चिन्तक चंद करोड़।। सुरेश साहनी कानपुर
 हम जमीं आसमान हैं गुरुवर हाँ जगत से महान हैं गुरुवर है जगत राग रंग में ग़ाफ़िल नाद अनहद की तान हैं गुरुवर बस अहम मानने नहीं देता किस क़दर ज्ञानवान हैं गुरुवर ब्रम्ह सम हैं कि गुरु स्वयं शिव हैं या जगतपति समान हैं गुरुवर जिनसे विज्ञान भी समादृत है धर्म का वह निशान हैं गुरुवर सुरेश साहनी कानपुर
 चाहते सब हैं हम सुधर जायें पर बताते नहीं किधर जायें कुछ का मन है कि हम उधर जायें आप कहते हैं हम इधर जायें क्या युवाओं का है कोई साहिल या कि दरिया में हम उतर जायें पाँव लटके हैं कब्र में उनके किसलिए नौनिहाल मर जायें मंज़िलें चल पड़ी हैं सिम्ते-सफ़र  हम कहाँ  किस तरह ठहर जायें सुरेश साहनी, कानपुर
 हर इक महरम की आदत हो गयी है। कि उसके  ग़म की आदत हो गयी है।। मिरे इस हाल पर हैरां न होना दरे-बरहम की आदत हो गयी है।। मिरी बदहालियों पर तंज करना अभी आलम की आदत हो गयी है।। मुहब्बत अशरफों में ढूँढता है उसे खातम की आदत हो गयी है।। उलझ कर रह गयी है जैसे हौव्वा यही आदम की आदत हो गयी है।। महरम/उपेक्षा,प्रतिबंधित संज्ञायें बरहम/अस्त व्यस्त, परेशान,कुद्ध आलम/संसार, स्थिति अशरफ/श्रेष्ठ, ऊँचे लोग खातम/ मुहर, ठप्पा या श्रेष्ठ चिन्ह सुरेश साहनी कानपुर 9451545132