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 क्या बचता प्रतिबिम्ब तुम्हारा  मन दर्पण तो टूट चुका है। जितना मुझसे हो सकता था उससे अधिक निभाया मैंने एक तुम्हारी ख़ातिर कितने अपनों को ठुकराया मैंने क्या बोलूँ जब मुझसे मेरा अपना दामन छूट चुका है।।..... इस मंदिर में तुम ही तुम थे जिसका प्रेम पुजारी था मैं पर तुमको यह समझ न आया सचमुच बड़ा अनाड़ी था मैं  प्रेम कहाँ अब बचा हृदय में हृदय कलश तो फूट चुका है।।.... माना मेरा दिल पत्थर है दिल में किन्तु तरलता भी है ऊपर ऊपर भले तपन   है पर मन मे शीतलता भी है किसको दोष लगाऊँ मुझसे आज समय तक रूठ चुका है।।... सुरेश साहनी 20अप्रैल 2019
 वो मुझे भूल भी जाता तो कोई बात न थी। फिर कभी याद न आता तो कोई बात न थी।। फिर कोई बात थी ऐसी तो बताता मुझसे या किसी को न बताता तो कोई बात न थी।।
 तुम्हें मैं और कितना याद रखता। कहाँ तक ज़िन्दगी नाशाद रखता।। ज़हाँ की हर ख़ुशी है तुमको हासिल तुम्हारे ग़म कहाँ आबाद रखता।। बुते-काफ़िर पिघल जाते यक़ीनन जो मैं जाकर वहाँ फ़रयाद रखता।। कफ़स के हक़ नहीं मानी वगरना तुम्हारा नाम मैं सय्याद रखता।। जो अज़मत इश्क़ की मालूम होती तो हरगिज़ हुस्न को बुनियाद रखता।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
बेशक़ नहीं हैं उसकी तरह महज़बीन हम। ये और बात है कि नहीं कम हसीन हम।। बेशक़ है एहतराम भी खैरमकदम भी है ये और बात उससे नहीं मुतमईन हम।।  बेशक़ कि लासवाल हैं कुदरत के फैसले कुछ बात हैं कि उनसे नहीं मुतमईन हम।।
 मैंने सोचा था भले किरदार को पूजेंगे सब। क्या पता था एक दिन ऐयार को पूजेंगे सब।। पैरवी में झूठ की मशरूफ़ हर अख़बार है    कैसे कह दें कल के दिन अख़बार को पूजेंगे सब।। आज ईसा और मूसा पायेंगे दार-ओ-सलिब और कल बढ़कर सलीब-ओ-दार को पूजेंगे सब।। कह के बाज़ारु अदब को कर रहे थे जो ज़लील क्या पता था कल इसी बाज़ार को पूजेंगे सब।।
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 जब उषा को बिन बताये रार कर निकला नून लकड़ी तेल की तक़रार पर निकला साँझ फिर मनुहार कर स्मित अधर लौटा।।
 भले ही तुम्हारे साथ गलत हुआ लेकिन उसकी ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। माननीय हाइ कोर्ट ठीक ही तो कहा है साहब ने। तुम अपने अंग साथ लेकर क्यों घूमती हो। यही बात तो भागवत जी बोलते हैं कि स्त्री घर सम्हालते हुये ही अच्छी लगती हैं। कॉलेज में सैकड़ों लड़कियां हैं।तुम्हारे साथ ही क्यों? क्या ज़रूरत है घर से बाहर निकलने की? अब ये अलग बात है कि सुरक्षा तो घर परिवार में भी नहीं है। घर से विद्यालय आते जाते बच्चियों पर घर के नुक्कड़ से स्कूल के मोड़ कहाँ वहशी निगाहें नहीं चुभती हैं। ऑटो में,टैक्सी में,बस में या फिर ट्रेन में हर जगह तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार के लिये तुम ही ज़िम्मेदार हो। बुआ ठीक तो कह रही," तुम्हाये जीजा हैं।आधो हक़ तो बनतो है'। कोई बात नहीं देवर है समझा देंगे। या छोड़ो भी एक महीना तो जेठ का भी होता है। तुम भी सम्हाल के चला करो"  वैसे भी तुम्हें सहन कर लेना चाहिये। दरोगा जी का पूछना जायज है। तुम चिल्लाई तो किसी ने सुना क्यों नहीं। वकील साहब तो और पढ़े लिखे हैं वो तुम्हारे दर्द का आकार और अंगवस्त्र के नम्बर भी पूछ सकते हैं।  तुम्हारी शिकायत  सही नहीं तुम ही गलत हो। प्रधान जी सही कह...