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 ज़िन्दगी क्या है मुसलसल इक सफ़र। मौत क्या है बस बदलना रहगुज़र।। ज़िंदगी है चार दिन का इक ठहर। मौत है फिर से शुरूआते-सफ़र।। आम हो या ख़ास कोई भी बशर। एक दिन जाना है सबको छोड़ कर।। जिस्म है  केवल किराए का मकान लाख हम दावा करें अपना है घर।। हो  तवाज़ुन में तुम्हारे पुल-सिरात साहनी अब आकिबत की फ़िक्र कर।।
 नाविक ले चल पार नदी के मन्थर मन्थर नाव डुलाते। उस तट पर कुछ मनहर मनहर मीठी मीठी तान सुनाते।। नाविक ले चल..... लहर लहर को छेड़ रही है भँवर द्वेषवश घूम रहा है बचना दूर उधर प्रणायकुल चाँद नदी को चूम रहा है नदी नियंत्रण न खो बैठे अपने तट तक आते आते।। नाविक ले चल....... अभी देखने हैं जीवन के रंग रूपहरे और सुनहरे स्मृतियों के अग्रदूत का सम्मेंलित स्वरूप फिर उभरे घड़ियां मधुर मिलन की बीतें भरते स्मृतियों के खाते।। नाविक ले चल.... सहज दुरूह परिस्थितियों में वातों में झंझावातों में सुख में दुःख में समस्थिति में आघातों में प्रतिघातों में हम तुम संग रहेंगे हिलमिल  चलो यहीं हैं नीड़ बनाते।। नाविक ले चल..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 आपकी बेपर्दगी की बात जाने दीजिये। छोड़िये शर्मिंदगी की बात जाने दीजिये।। हुस्न उनका पा चुका है अब  जवालों का उरूज़ इश्क़ के दीवानगी की बात जाने दीजिये।। जबकि दरियाओं की गहराई से हम दो चार हैं उस ज़ुनूने-तिश्नगी की बात जाने दीजिये।।  कम से कम इस उम्र में तो दिल्लगी अच्छी नहीं  आप और संजीदगी की बात जाने दीजिये।। मर चुकी हैं हसरतें चाहत ख़यालो-ख़्वाब सब अब हमारी ज़िन्दगी की बात जाने दीजिये।। सुरेश साहनी,कानपुर 9451545132
 और तुझ पर यक़ीन कर लें हम। क्या हवा को ज़मीन कर लें हम।। डसने वालों से एहतियात रखें या क़लम आस्तीन कर लें हम।। हुस्न के पैंतरे न आएंगे लाख ख़ुद को ज़हीन कर लें हम।। आदमियत कहीं न मर जाये यूँ न ख़ुद को मशीन कर लें हम।। हुस्न को जाविदां बनाने को ख़ुद को अब दो से तीन कर लें हम।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हम थे यूँ भी ग़रीब क्या जीते। दूसरों का नसीब क्या जीते।। दूर रहकर अजाब देता है उसके होकर क़रीब क्या जीते।।साहनी
 तुम को ख़ुद पर यक़ीन है या फिर। शक की कोई ज़मीन है या फिर।। ज़िन्दगी तू तो ख़ूबसूरत है मौत भी कुछ हसीन है या फिर।। तुम भी फुफकारने लगे मुझ पर ये मेरी आस्तीन है या फिर।। क्यों नहीं रोकता गुनाहों को पास उसके भी बीन है या फिर।। दर्द की कैफियत बताती है इश्क़ ताज़ातरीन है या फिर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हम अगर हम से मिल नहीं पाये। तुम भी तो तुम से मिल नहीं पाए।। लज़्ज़ते-ग़म है इश्क़ की ऐसी हम किसी ग़म से मिल नहीं पाये।। हम अना में पहुँच के बामे-अदम यूँ गिरे धम से मिल नहीं पाये।। आशना होके कब मिले तुम भी हम भी हमदम से मिल नहीं पाये।। ताब-ए-तिश्नगी रही इतनी होठ शबनम से मिल नहीं पाये।। इश्क़ की मय तलब में थी लेकिन हुस्न के खम से मिल नहीं पाये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132