भावों में शुचिता रखते तो प्रेम हमारा पावन होता अक्षुण्ण होती नेह वर्तिका सतसम्बन्ध सनातन होता
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दूर रहते हुये ही मिल लेना। कुछ झिझकते हुए ही मिल लेना। दिन निकलते हुये ही मिल लेना। शाम ढलते हुये ही मिल लेना।। तुमसे करने हैं कुछ सवाल मुझे नफ़्स रहते हुये ही मिल लेना।। मिल न पाये उरूज़ के दौरान ख़ैर ढलते हुये ही मिल लेना।। रात तुम नींद से रहे बोझिल आँख मलते हुए ही मिल लेना।। रुक के शायद कभी न मिल पाओ तुम टहलते हुये ही मिल लेना।। वस्लो-फुरक़त कि अब किसे परवाह पर न मिलते हुये ही मिल लेना।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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क्या कहा हम भी यार थे उनके सब तो उम्मीदवार थे उनके हम भी थे हुस्न के असीरों में पर न बीमार- वार थे उनके एक हम आशना रहे तो क्या यूँ तो आशिक़ हज़ार थे उनके ख़ूब चर्चे थे दौरे कालेज में हर तरफ़ इश्तेहार थे उनके हुस्न तो बेपनाह था उन पर हर तरफ जाँनिसार थे उनके तब खिज़ां का उन्हें ख़याल न था क्या गुमाने-बहार थे उनके आज कतरा रहे हो मिलने से कल बड़े ग़मगुसार थे उनके सुरेश साहनी कानपुर 9451545132