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 भावों में शुचिता रखते तो प्रेम हमारा पावन होता अक्षुण्ण होती नेह वर्तिका सतसम्बन्ध सनातन होता
 दूर रहते हुये ही मिल लेना। कुछ झिझकते हुए ही मिल लेना।  दिन निकलते हुये ही मिल लेना। शाम ढलते हुये ही मिल लेना।। तुमसे करने हैं कुछ सवाल मुझे नफ़्स रहते हुये ही मिल लेना।। मिल न पाये उरूज़ के दौरान ख़ैर ढलते  हुये ही मिल लेना।। रात तुम नींद से रहे बोझिल आँख मलते हुए ही मिल लेना।। रुक के शायद कभी न मिल पाओ तुम टहलते हुये ही मिल लेना।। वस्लो-फुरक़त कि अब किसे परवाह पर न मिलते हुये ही मिल लेना।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 क्या कहा हम भी  यार थे  उनके सब तो उम्मीदवार थे उनके हम भी थे हुस्न के असीरों में पर न बीमार- वार थे उनके एक हम आशना रहे तो क्या  यूँ तो आशिक़ हज़ार थे उनके ख़ूब चर्चे थे दौरे कालेज में हर तरफ़ इश्तेहार थे उनके हुस्न तो बेपनाह था उन पर हर तरफ जाँनिसार थे उनके तब खिज़ां का उन्हें ख़याल न था क्या गुमाने-बहार थे उनके आज कतरा रहे हो मिलने से कल बड़े ग़मगुसार थे उनके सुरेश साहनी कानपुर  9451545132
 यारों की कमज़र्फ़ी है तस्लीम मगर दुश्मन हो ख़ुद्दार हमेशा ध्यान रहे।।साहनी
 कैसे कह दें कि हम रहे तन्हा कौन मानेगा ग़म रहे तन्हा हम थे मज़लूम भीड़ का हिस्सा वो थे करके सितम रहे तन्हा जो थे अहले यक़ीन साथ रहे सिर्फ़ अहले-वहम रहे तन्हा भीड़ के बाद भी न जाने क्यों पत्थरों के सनम रहे तन्हा मयकदे में हमें सुकून तो है कौन जाकर अदम रहे तन्हा सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 बेशक़ है दिल्ली रजधानी है अपनी फिर भी अनजानी वैसे बहुतेरे अपने है फिर क्यों है इतनी बेगानी रोज कथा घर एक बसा कर रोज उजड़ती एक कहानी यहाँ झोंपड़ी पर चलती है हवसी महलों की मनमानी बचना इन नादिरशाहों से ठहरा देंगे पाकिस्तानी फिर फिर दिल्ली क्यों आता है यह सुरेश करने नादानी.
 तन से बाहर तो निकालें ख़ुद को और आईना बना लें ख़ुद को गर्द जो तन पे है धूल जायेगी क्यों ना अन्दर से खंगालें ख़ुद को साहनी