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 खुशी के पल सँजोना चाहती है। तमन्ना हँस के रोना चाहती है।। फलक बेशक़ जगाना चाहता हो ज़मीं भर नींद सोना चाहती है।। उसे मुझ से मुहब्बत खाक़ होगी वो नादाँ है खिलौना चाहती है।। थकी जाती है फिर भी ज़िंदगानी खुद अपनी लाश ढोना चाहती है।। मुहब्बत में मेरी हस्ती बिखर कर सरापा नूर होना चाहती है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हक़ में उठती आवाज़ों पर पहरा देता है। ये मज़लूमों को अपराधी ठहरा देता है।।
 शिद्दत से तेरे ख़्वाब संजोये भी नहीं हैं। क्या खाक़ हँसें ख़ुद पे तो रोये भी नहीं हैं।। डर है कि तेरे ख़्वाब परेशान न कर दें क्या जागें अभी ठीक से सोये भी नहीं हैं।।
 उसने क्यों तर है मेरा रुमाल नहीं पूछा। ख़ूब पता है क्यों उसने अहवाल नहीं पूछा।। क्या पत्थर से शिकवा करते जब आईने ने देखा समझा फिर भी मेरा हाल नहीं पूछा।।
 पद पर जब तक रहे घूमते फिरते थे अकड़े। सोच रहे हैं अब भी दुनिया उनके पैर पड़े।। नहैं किसी से रामरहारी दुआ सलाम नहीं उससे सीधे मुँह ना बोले जिससे काम नहीं अपने मातहतों के सिर पर हरदम रहे खड़े।। क्या मजाल थी कोई काम के लिये उन्हें टोके हाँ टेबल के नीचे वाले काम नहीं रोके कम वेतन में आमदनी के स्रोत मिले तगड़े।। अफसर थे तो कदम कदम पर सेवा टहल रही आज नहीं हैं ठसक अफसरी फिर भी मचल रही आज मेम भी सोच रही हैं कौन धुले कपड़े।। सुरेश साहनी कानपुर रिटायर 9451545132
 कुछ इतने दूर तुम रहने लगे हो। जनम के अजनबी लगने लगे हो।। कभी बादे-सबा थे तुम हुआ क्या ये किस अंदाज़ में बहने लगे हो।। नहीं होता है अब इक शेर नाज़िल तो क्या  खारिज़ हमें करने लगे हो।। जो हमको देखकर चौंके हो जानम ये तुम किस बात से डरने लगे हो तुम्हें  वो साहनी भी चाहता है कहीं तुम तो नहीं  मरने लगे हो।। साहनी सुरेश कानपुर
 हुये रिटायर जान रहे हैं लेकिन पाल गुमान रहे हैं साहब अब भी अहंकार वश ख़ुद को साहब मान रहे हैं।। सोच रहे हैं कल भी उनको बाबू लोग सलामी देंगे और मुहल्ले वाले उनको अब भी साहब ही बोलेंगे कितनी ठसक रही है आख़िर वे  दफ्तर की शान रहे हैं।। और विदाई वाला मन्ज़र याद सुबह और शाम रहेगा सब बोले थे जब तक धरती है साहब का नाम रहेगा यूँ भी उनके आगे पीछे दस दस ठो दरबान रहे हैं।। लेकिन इन दो चार दिनों में बदल गया है सारा मन्ज़र अब पड़ोस के ठलुवे इनको समझ रहे है रंक बराबर किंतु ख़यालों में साहब जी अब भी ख़ुद को तान रहे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132