हक़ में उठती आवाज़ों पर पहरा देता है। ये मज़लूमों को अपराधी ठहरा देता है।।
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पद पर जब तक रहे घूमते फिरते थे अकड़े। सोच रहे हैं अब भी दुनिया उनके पैर पड़े।। नहैं किसी से रामरहारी दुआ सलाम नहीं उससे सीधे मुँह ना बोले जिससे काम नहीं अपने मातहतों के सिर पर हरदम रहे खड़े।। क्या मजाल थी कोई काम के लिये उन्हें टोके हाँ टेबल के नीचे वाले काम नहीं रोके कम वेतन में आमदनी के स्रोत मिले तगड़े।। अफसर थे तो कदम कदम पर सेवा टहल रही आज नहीं हैं ठसक अफसरी फिर भी मचल रही आज मेम भी सोच रही हैं कौन धुले कपड़े।। सुरेश साहनी कानपुर रिटायर 9451545132
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कुछ इतने दूर तुम रहने लगे हो। जनम के अजनबी लगने लगे हो।। कभी बादे-सबा थे तुम हुआ क्या ये किस अंदाज़ में बहने लगे हो।। नहीं होता है अब इक शेर नाज़िल तो क्या खारिज़ हमें करने लगे हो।। जो हमको देखकर चौंके हो जानम ये तुम किस बात से डरने लगे हो तुम्हें वो साहनी भी चाहता है कहीं तुम तो नहीं मरने लगे हो।। साहनी सुरेश कानपुर
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हुये रिटायर जान रहे हैं लेकिन पाल गुमान रहे हैं साहब अब भी अहंकार वश ख़ुद को साहब मान रहे हैं।। सोच रहे हैं कल भी उनको बाबू लोग सलामी देंगे और मुहल्ले वाले उनको अब भी साहब ही बोलेंगे कितनी ठसक रही है आख़िर वे दफ्तर की शान रहे हैं।। और विदाई वाला मन्ज़र याद सुबह और शाम रहेगा सब बोले थे जब तक धरती है साहब का नाम रहेगा यूँ भी उनके आगे पीछे दस दस ठो दरबान रहे हैं।। लेकिन इन दो चार दिनों में बदल गया है सारा मन्ज़र अब पड़ोस के ठलुवे इनको समझ रहे है रंक बराबर किंतु ख़यालों में साहब जी अब भी ख़ुद को तान रहे हैं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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ढूँढने अक्सर हमें जाते हैं हम। हम नहीं मिलते तो घबराते हैं हम।। जब नहीं मिलते ज़हाँ की भीड़ में लौट कर तन्हा चले आते हैं हम।। क्या जिसे दैरोहरम में खोजते मयकदे में रूबरू पाते हैं हम।। अब भी दिल करता है तेरी आरज़ू अब भी अपने दिल को समझाते हैं हम।। टूटता है अब भी जब तारा कोई तब दुआओं में तुझे लाते हैं हम।। साहनी के ख़्वाब कब के लुट चुके क्या तुम्हारे ख़्वाब में आते हैं हम।। सुरेश साहनी अदीब