कल एक कविता यद्यपि उसे कविता कहना कविता की अवमानना होगी परन्तु मैंने उसे बेहद खूबसूरत कविता कहा क्योंकि मुझे पता है वह उस कविता से भी बेकार और निम्न स्तरीय मेरी कविताओं की सराहना करता है और कहता है लाजवाब!!! सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
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याचना स्वीकार मेरी प्राण तुमसे हो न पायी तुम कहाँ वन वन भटकती सो महल में जा समाई।। जानकी तुम क्या ही होती राम मैं भी हो न पाया और योगी सम लखन निष्काम मैं भी हो न पाया रक्षवृत्तीय हो चुकी हैं अर्थयुग में कामनाएं अब श्रवण किसके भला सुनते हैं निर्धन की दुहाई।।.... देखना दृग कन्त के अरु कन्त पद अनुसरण करना सात जन्मों तक निभाना साथ जिसका वरण करना मैं यही आदर्श लेकर आज एकाकी खड़ा हूँ तुम समय के साथ हो इसमें भला कैसी बुराई।। .....
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अभी चल रही हैं उम्मीदों की साँसें। चलो रोशनी में अंधेरे तलाशें।। अभी हँस रहे हैं मिलेगी जो फुरसत निकालेंगे आहें भरेंगे उसाँसें ।। चलो हम करें एक दूजे को रोशन हमें तुम संवारो तुम्हें हम तराशें।। ये सब जीस्त को काटने के लिये हैं खुशी की कुल्हाड़ी गमों की गड़ासें।। ये किसने कहा है अंधेरा मिटेगा निकलती नहीं हैं कभी तम की फांसें।। यही है वफ़ा का सिला साहनी जी उठाते रहो आरजुओं की लाशें।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
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शायद तुम मुस्काना चाहो। खुशियों को अपनाना चाहो।। मन मत मारो पा सकते हो जो तुम दिल से पाना चाहो।। गागर फूटी एक दुखद है दूजी गागर ले सकते हो दुख पर रक़्स करो फिर देखो खुशियाँ मन भर ले सकते हो नभ ने बाँह पसार लिए हैं उड़ो अगर तुम आना चाहो ।। रात्रि गहन थी तो क्या अब तो सुखद लालिमा झांक रही है क्यारी क्यारी किलकी कलियां रश्मि रथों को ताक रही हैं उठो रोशनी बन यादों के तम को यदि बिसराना चाहो ।। पतझर का संकेत यही है ऋतु राजा को फिर आना है आना जाना जाना आना जीवन का ताना बाना है जीवन है संगीत समझ लो गाओ बस तुम गाना चाहो ।। सुरेश साहनी
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अक्सर उसको लोग ग़ज़ल भी कहते हैं। कुछ तो ज़िंदा ताजमहल भी कहते हैं।। उसे समझना बेशक़ मुश्किल है लेकिन उसको हर मुश्किल का हल भी कहते हैं।। कुछ कहते हैं मू - ए-मुकद्दस है तो कुछ लोग इसे ही हज़रत बल भी कहते हैं।। उसकी ज़ुल्फ़ें लंबी नज़्में लगती हैं कुछ उसको किस्मत का बल भी कहते हैं।। उसका चेहरा क्या नूरानी है वल्लाह देखने वाले सुर्ख कँवल भी कहते हैं।। जाने क्यों अब इस सुरेश को दीवाना कहने वाले ही पागल भी कहते हैं।। सुरेश साहनी, कानपुर