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 कब न थे कब थे हमारी ज़िन्दगी के मायने। आप कब समझे हमारी किस खुशी के मायने।। मेरे जीते जी न समझा जो हमारे दर्द को क्या समझता फिर हमारी खुदकुशी के मायने।। हुस्न वालों को पता है हुस्न की रांनाईयाँ इश्क़ वाले जानते हैं आशिक़ी के मायने।। जिस ख़ुदा की राह में मरता रहा है आदमी क्या पता है उस ख़ुदा को बन्दगी के मायने।। हम से बेपर्दा हुआ जो क़ुर्बतों के नाम पर वो हमें समझा रहा है पर्दगी के मायने।। जो चरागों को बुझाने में हवा के साथ थे क्या  बतायेंगे हमें वो रोशनी के मायने।। कितनी दरियाओं का पानी पी रहा है रात दिन इक समन्दर को पता है तिश्नगी के मायने।। सुरेश साहनी, कानपुर
 और जाते भी तो कहाँ आख़िर। छोड़ कर क़ू-ए-जाने-जां आख़िर।। हम गदायी हुये तो हैरत क्यों कैसे बेहतर है लामकां आख़िर।।
 किस वफ़ा की तलाश है तुमको क्या ख़ुदा  की तलाश है तुमको।। इश्क़ तुमको हुआ यकीन नहीं जब अना की तलाश है तुमको।। जिसको सुन कर वो लौट सकता था उस सदा की तलाश है तुमको।। कुछ तो सपनों से ख़ुद को दूर करो क्या हवा की तलाश है तुमको।। सुरेश साहनी कानपुर
 ये सोचकर कि सवेरे का क्या भरोसा है घनेरी रात को पूरी तरह जिया मैंने।।साहनी
 यूँ कम नहीं कमाया तुमने घर परिवार बनाया तुमने उठना भारी जहाँ स्वयं का सब का बोझ उठाया तुमने
 आज अपने ख़िलाफ़ है सब कुछ मूड क्या आज ऑफ है सब कुछ मेरा उसका बंटा हुआ क्या है प्यार में हाफ हाफ है सब कुछ कुछ भी पढ़िए कोई न बोलेगा गोष्ठी में मुआफ़ है सब कुछ नींद जाने किधर है क्या बोलें यूँ तो बिस्तर लिहाफ है सब कुछ मेरा दिल मेरी जेब आईना और मौसम भी साफ है सब कुछ सुरेशसाहनी, कानपुर
 क्यों इतने बदहवास से बैठे हुए हो तुम। मुद्दत हुई उदास  से बैठे हुए हो तुम।। कपड़े नहीं ख़याल से जो बरहना लगे कुछ ऐसे बेलिबास से बैठे हुए हो तुम।।