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 आज हनुमान जी बड़ी तेजी में जाते दिखाई दिए।पहले मैंने सोचा कि उनको परणाम कर लें।फिर पता नहीं क्या सोचा कि ठिठक गए।मैंने सोचा सुबह सुबह प्रभु कहीं जरूरी काम से जा रहे हैं ,सो टोकना ठीक नहीं।वैसे भी जैसे तुलसी बाबा ने लिखा भी है कि  "प्रात  लेहि जो  नाम  हमारा। ता दिन ताहि न मिलै अहारा।।"   यदि यही चौपाई हमहूँ पर लागू होती होगी तो हनुमान जी दिन भर भूखे ना रहि जाएं। आखिर तुलसी बाबा ने हमको भी कहाँ छोड़ा है। कायर कपटी कुमति कुजाती। लोक वेद बाहर सब भाँती।। सो हम यह सोच के चुप रह गए। लेकिन अचानक हनुमान जी पीपल के पेड़ के पास जाकर रुक गए।मैंने देखा कि वे अपना मूँज का जनेऊ उतार के पीपल के पेड़ पर टांग रहे थे। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने जाकर उन्हें प्रणाम किया।वे भी जैसे किसी को ढूंढ ही रहे थे।मुझे देखकर उनके मन मे कनपुरियों के प्रति खराब वाली अवधारणा मिट गई होगी।फिर भी उन्होंने "लंका निसिचर निकर निवासा, वाले अंदाज में पूछ ही लिया - आप? - जी मैं सुरेश साहनी । कवि हूँ। इतना सुनते ही हनुमान जी जाने को उद्यत हो गए। उन्हें लगा होगा कि कहीं ये कविता न सुनाने लग जाये।कविय...
 हम थे किस को तलाशने निकले। कब थे ख़ुद को तलाशने निकले।। अपने दिल मे न झाँक पाये हम और उसको तलाशने निकले।। कब ख़िरदमंद को मिला है वो कौन रब को तलाशने निकले।। हम थे पागल सराय-फानी में अपने घर को तलाशने निकले।। क्यों न मिलता सुरेश दुख तुमको तुम थे सुख को तलाशने निकले।। साहनी
 चार दिन ही गये हुआ मुझको। और तुमने भुला दिया मुझको।। जबकि दरकार थी दुआ मुझको। क्यो पिलाई गई दवा मुझको।। कह रहे हैं वो बेवफ़ा मुझको। जो कि देते रहे दगा मुझको।। तुमने भी क्या नहीं कहा मुझको। क्या कभी गौर से सुना मुझको।। जिस्म भी थक चुका था हिज़रत से और घर छोड़ना पड़ा मुझको।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 साथ तुम्हारे दिल तन्हा है । फिर भी कहते हो रिश्ता है।। दिल क्या कोई आईना है। दरका  चटका या  टूटा है।। ग़ैरों में जब तुम शामिल हो और किसे कह दूँ अपना है।। अब किस पर श्रृंगार करूँ मैं मेरा तन   मेरी बेवा है ।। मेरे कंधे पर मैं ख़ुद हूँ दोनों में इक तो ज़िंदा है।। सुरेश साहनी अदीब 9451545132
 तुमको तन्हा होना ही था तुमने सच क्यों बोला ही था।। झूठ जहाँ से चुना गया है पहले सच का टोला ही था।।
 दरहक़ीक़त हमें पहचान रहे हो तो कहो। इक ज़रा सा भी अगर जान रहे हो तो कहो।। तुम कभी दिल मे रहे हो हमें मालूम नहीं ख़्वाब में भी कभी मेहमान रहे हो तो कहो।। आदमी होना बड़ी बात नहीं हम भी हैं दिल से लेकिन कभी इन्सान रहे हो तो कहो।। कल फरिश्ते थे मगर आज हैं इबलीश बहुत अब मलायक कभी शैतान रहे हो तो कहो।। दीन क्या है फ़क़त इन्सान की ख़िदमत करना खूब जाने हो मगर मान रहे हो तो कहो।। सुरेश साहनी, कानपुर 945154532
 मुल्क बलवाइयों के घेरे में। धर्म दंगाइयों के घेरे में।। झूठ के सैकड़ों समर्थक है सच है तन्हाइयों के घेरे में।।