बेशक़ नहीं हैं उसकी तरह महज़बीन हम। ये और बात है कि नहीं कम हसीन हम।। बेशक़ है एहतराम भी खैरमकदम भी है ये और बात उससे नहीं मुतमईन हम।। बेशक़ कि लासवाल हैं कुदरत के फैसले कुछ बात हैं कि उनसे नहीं मुतमईन हम।।
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मैंने सोचा था भले किरदार को पूजेंगे सब। क्या पता था एक दिन ऐयार को पूजेंगे सब।। पैरवी में झूठ की मशरूफ़ हर अख़बार है कैसे कह दें कल के दिन अख़बार को पूजेंगे सब।। आज ईसा और मूसा पायेंगे दार-ओ-सलिब और कल बढ़कर सलीब-ओ-दार को पूजेंगे सब।। कह के बाज़ारु अदब को कर रहे थे जो ज़लील क्या पता था कल इसी बाज़ार को पूजेंगे सब।।
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भले ही तुम्हारे साथ गलत हुआ लेकिन उसकी ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। माननीय हाइ कोर्ट ठीक ही तो कहा है साहब ने। तुम अपने अंग साथ लेकर क्यों घूमती हो। यही बात तो भागवत जी बोलते हैं कि स्त्री घर सम्हालते हुये ही अच्छी लगती हैं। कॉलेज में सैकड़ों लड़कियां हैं।तुम्हारे साथ ही क्यों? क्या ज़रूरत है घर से बाहर निकलने की? अब ये अलग बात है कि सुरक्षा तो घर परिवार में भी नहीं है। घर से विद्यालय आते जाते बच्चियों पर घर के नुक्कड़ से स्कूल के मोड़ कहाँ वहशी निगाहें नहीं चुभती हैं। ऑटो में,टैक्सी में,बस में या फिर ट्रेन में हर जगह तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार के लिये तुम ही ज़िम्मेदार हो। बुआ ठीक तो कह रही," तुम्हाये जीजा हैं।आधो हक़ तो बनतो है'। कोई बात नहीं देवर है समझा देंगे। या छोड़ो भी एक महीना तो जेठ का भी होता है। तुम भी सम्हाल के चला करो" वैसे भी तुम्हें सहन कर लेना चाहिये। दरोगा जी का पूछना जायज है। तुम चिल्लाई तो किसी ने सुना क्यों नहीं। वकील साहब तो और पढ़े लिखे हैं वो तुम्हारे दर्द का आकार और अंगवस्त्र के नम्बर भी पूछ सकते हैं। तुम्हारी शिकायत सही नहीं तुम ही गलत हो। प्रधान जी सही कह...
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बरसे कम्बल भीजे पानी पढ़ते हो। क्यों कबीर की उल्टी बानी पढ़ते हो।। कौन हुआ है पंडित ढाई आखर से क्यों तुम ऐसी गलत बयानी पढ़ते हो।। मगहर भेजे ही जाओगे काशी से नाहक़ साखी सबद रमानी पढ़ते हो।। सबहिं नचावत राम गुसाईं मालुम है फिर भी भोला अवढर दानी पढ़ते हो।। कुछ तो हटकर था कबीर में जिस से तुम उस अनपढ़ को होकर ज्ञानी पढ़ते हो।। अम्मा के जीते जी आंगन बाँट लिया आख़िर कैसी रामकहानी पढ़ते हो।। तुम सुरेश अपने अन्दर कब झांकोगे औरों की तो कारस्तानी पढ़ते हो।। सुरेश साहनी कानपुर
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जाना हुआ फुज़ूल गये क्यों। आख़िर तुम स्कूल गये क्यों।। जाति बहुत माने रखती हैं यह कड़वा सच भूल गये क्यों।। ख़्वाब जिबह होने तो तय थे बनकर तुम मक़तूल गये क्यों।। अब कालीदह में यमुना है फिर कालिन्दी कूल गये क्यों।। अब भी वही हस्तिनापुर है एकलव्य तुम भूल गये क्यों।। साकी नासेह से वायस था तुम कब थे मक़बूल गये क्यों।। सुनो साहनी हर सवाल का है जवाब माकूल गये क्यों।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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किस मन की बात सुनें क्या मन की बात करें। सावन में तुम बिन क्या सावन की बात करें।। क्यों इनकी बात करें क्या उनकी बात करें। क्यों ना हम राधा और मोहन की बात करें।। सर्पों से लिपटे ज्यों चंदन की बात करें। विरहानल में जलते दो तन की बात करें। घावों पर मरहम के लेपन की बात करें।। मिश्री सी बात सुनें माखन की बात करें आओ हम राधा और मोहन की बात करें। ग्वालों की गोपियन की गैय्यन की बात करें।। बंशी की धुन पर सुध रीझन की की बात करें गुंजन की बात करें, मधुवन की बात करें।। किस मन से यशुदा के नन्दन की बात करें।। पुष्प पथ में बिछाये हैं रख दो चरण। आपसे स्नेह का है ये पुरश्चरण।। प्रीति के पर्व का यह अनुष्ठान है दृष्टि का अवनयन लाज सोपान है सत्य सुन्दर की सहमति है शिव अवतरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।। कुछ करो कि स्वयम्वर सही सिद्ध हो सिद्धि हो और रघुवर सही सिद्ध हो शक्ति बन मेरे भुज का करो प्रिय वरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।। ओम सत्यम शिवम सुन्दरम प्रीति हो युगयुगान्तर अमर प्रीति की कीर्ति हो लोग उध्दृत करें राम का आचरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।।