क्या कहा हौलनाक है ही नहीं। इस से बढ़कर मज़ाक है ही नहीं।। इश्क़ को इत्तेफ़ाक़ जायज़ है हुस्न को इत्तेफाक है ही नहीं।। हुस्न परदा करे करे ना करे इश्क़ पर झाँक-ताक है ही नहीं।। आशिक़ी क्यों न हो तेरी ख़ारिज तू गिरेबान चाक़ है ही नहीं।। साहनी तुझ को होश है अब तक तू मिरा इश्तियाक़ है ही नहीं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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खुशी के पल सँजोना चाहती है। तमन्ना हँस के रोना चाहती है।। फलक बेशक़ जगाना चाहता हो ज़मीं भर नींद सोना चाहती है।। उसे मुझ से मुहब्बत खाक़ होगी वो नादाँ है खिलौना चाहती है।। थकी जाती है फिर भी ज़िंदगानी खुद अपनी लाश ढोना चाहती है।। मुहब्बत में मेरी हस्ती बिखर कर सरापा नूर होना चाहती है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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पद पर जब तक रहे घूमते फिरते थे अकड़े। सोच रहे हैं अब भी दुनिया उनके पैर पड़े।। नहैं किसी से रामरहारी दुआ सलाम नहीं उससे सीधे मुँह ना बोले जिससे काम नहीं अपने मातहतों के सिर पर हरदम रहे खड़े।। क्या मजाल थी कोई काम के लिये उन्हें टोके हाँ टेबल के नीचे वाले काम नहीं रोके कम वेतन में आमदनी के स्रोत मिले तगड़े।। अफसर थे तो कदम कदम पर सेवा टहल रही आज नहीं हैं ठसक अफसरी फिर भी मचल रही आज मेम भी सोच रही हैं कौन धुले कपड़े।। सुरेश साहनी कानपुर रिटायर 9451545132
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कुछ इतने दूर तुम रहने लगे हो। जनम के अजनबी लगने लगे हो।। कभी बादे-सबा थे तुम हुआ क्या ये किस अंदाज़ में बहने लगे हो।। नहीं होता है अब इक शेर नाज़िल तो क्या खारिज़ हमें करने लगे हो।। जो हमको देखकर चौंके हो जानम ये तुम किस बात से डरने लगे हो तुम्हें वो साहनी भी चाहता है कहीं तुम तो नहीं मरने लगे हो।। साहनी सुरेश कानपुर