भले ही तुम्हारे साथ गलत हुआ लेकिन उसकी ज़िम्मेदार तुम ख़ुद हो। माननीय हाइ कोर्ट ठीक ही तो कहा है साहब ने। तुम अपने अंग साथ लेकर क्यों घूमती हो। यही बात तो भागवत जी बोलते हैं कि स्त्री घर सम्हालते हुये ही अच्छी लगती हैं। कॉलेज में सैकड़ों लड़कियां हैं।तुम्हारे साथ ही क्यों? क्या ज़रूरत है घर से बाहर निकलने की? अब ये अलग बात है कि सुरक्षा तो घर परिवार में भी नहीं है। घर से विद्यालय आते जाते बच्चियों पर घर के नुक्कड़ से स्कूल के मोड़ कहाँ वहशी निगाहें नहीं चुभती हैं। ऑटो में,टैक्सी में,बस में या फिर ट्रेन में हर जगह तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार के लिये तुम ही ज़िम्मेदार हो। बुआ ठीक तो कह रही," तुम्हाये जीजा हैं।आधो हक़ तो बनतो है'। कोई बात नहीं देवर है समझा देंगे। या छोड़ो भी एक महीना तो जेठ का भी होता है। तुम भी सम्हाल के चला करो" वैसे भी तुम्हें सहन कर लेना चाहिये। दरोगा जी का पूछना जायज है। तुम चिल्लाई तो किसी ने सुना क्यों नहीं। वकील साहब तो और पढ़े लिखे हैं वो तुम्हारे दर्द का आकार और अंगवस्त्र के नम्बर भी पूछ सकते हैं। तुम्हारी शिकायत सही नहीं तुम ही गलत हो। प्रधान जी सही कह...