ढूँढने अक्सर हमें जाते हैं हम। हम नहीं मिलते तो घबराते हैं हम।। जब नहीं मिलते ज़हाँ की भीड़ में लौट कर तन्हा चले आते हैं हम।। क्या जिसे दैरोहरम में खोजते मयकदे में रूबरू पाते हैं हम।। अब भी दिल करता है तेरी आरज़ू अब भी अपने दिल को समझाते हैं हम।। टूटता है अब भी जब तारा कोई तब दुआओं में तुझे लाते हैं हम।। साहनी के ख़्वाब कब के लुट चुके क्या तुम्हारे ख़्वाब में आते हैं हम।। सुरेश साहनी अदीब
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क्या बचता प्रतिबिम्ब तुम्हारा मन दर्पण तो टूट चुका है। जितना मुझसे हो सकता था उससे अधिक निभाया मैंने एक तुम्हारी ख़ातिर कितने अपनों को ठुकराया मैंने क्या बोलूँ जब मुझसे मेरा अपना दामन छूट चुका है।।..... इस मंदिर में तुम ही तुम थे जिसका प्रेम पुजारी था मैं पर तुमको यह समझ न आया सचमुच बड़ा अनाड़ी था मैं प्रेम कहाँ अब बचा हृदय में हृदय कलश तो फूट चुका है।।.... माना मेरा दिल पत्थर है दिल में किन्तु तरलता भी है ऊपर ऊपर भले तपन है पर मन मे शीतलता भी है किसको दोष लगाऊँ मुझसे आज समय तक रूठ चुका है।।... सुरेश साहनी 20अप्रैल 2019
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तुम्हें मैं और कितना याद रखता। कहाँ तक ज़िन्दगी नाशाद रखता।। ज़हाँ की हर ख़ुशी है तुमको हासिल तुम्हारे ग़म कहाँ आबाद रखता।। बुते-काफ़िर पिघल जाते यक़ीनन जो मैं जाकर वहाँ फ़रयाद रखता।। कफ़स के हक़ नहीं मानी वगरना तुम्हारा नाम मैं सय्याद रखता।। जो अज़मत इश्क़ की मालूम होती तो हरगिज़ हुस्न को बुनियाद रखता।। सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
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मैंने सोचा था भले किरदार को पूजेंगे सब। क्या पता था एक दिन ऐयार को पूजेंगे सब।। पैरवी में झूठ की मशरूफ़ हर अख़बार है कैसे कह दें कल के दिन अख़बार को पूजेंगे सब।। आज ईसा और मूसा पायेंगे दार-ओ-सलिब और कल बढ़कर सलीब-ओ-दार को पूजेंगे सब।। कह के बाज़ारु अदब को कर रहे थे जो ज़लील क्या पता था कल इसी बाज़ार को पूजेंगे सब।।