तुमको तन्हा होना ही था तुमने सच क्यों बोला ही था।। झूठ जहाँ से चुना गया है पहले सच का टोला ही था।।
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दरहक़ीक़त हमें पहचान रहे हो तो कहो। इक ज़रा सा भी अगर जान रहे हो तो कहो।। तुम कभी दिल मे रहे हो हमें मालूम नहीं ख़्वाब में भी कभी मेहमान रहे हो तो कहो।। आदमी होना बड़ी बात नहीं हम भी हैं दिल से लेकिन कभी इन्सान रहे हो तो कहो।। कल फरिश्ते थे मगर आज हैं इबलीश बहुत अब मलायक कभी शैतान रहे हो तो कहो।। दीन क्या है फ़क़त इन्सान की ख़िदमत करना खूब जाने हो मगर मान रहे हो तो कहो।। सुरेश साहनी, कानपुर 945154532
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तुम्हें अपना बताना पड़ रहा है। मरासिम है निभाना पड़ रहा है।। बला से कोई रूठे या न रूठे हमें हम को मनाना पड़ रहा है।। हमें हम याद आये थे बमुश्किल अचानक भूल जाना पड़ रहा है।। तुम्हारे ग़म की दौलत छिन न जाये सहम कर मुस्कुराना पड़ रहा है।। शहर में पूछता है कौन किसको सड़क को गाँव आना पड़ रहा है।। कहाँ से रोशनी लाते वफ़ा की सो अपना दिल जलाना पड़ रहा है।। कभी महसूस होती थी मुहब्बत अभी कह कर जताना पड़ रहा है।। सुरेश साहनी कानपुर
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विष्णुपदी तू ही मातु तू ही शिवकेशिनी है तू ही गंगा तू ही मातु भारती है नर्मदे मध्य ही प्रदेश नहीं महाराष्ट्र गुजरात राज्य से भी ख़ुद को गुजारती है नर्मदे विंध्य सतपुड़ा मातु पाके तुझे धन्य हुए शिव विग्रहों को तू पखारती है नर्मदे जाके गुजरात पार म्लेच्छों को तो तारती है सिंधु को भी भव से उबारती है नर्मदे।। शांत रहूँ मातु तेरी तरह प्रशांत रहूँ हर्ष न प्रमाद न विषाद देना नर्मदे। जानता हूँ भली भांति कृपा है असीम तेरी भक्ति भाव उर में अगाध देना नर्मदे।। तू है निर्विवाद जैसे मैं भी निर्विवाद रहूँ जो भी देना मुझे निर्विवाद देना नर्मदे। गंगा पुत्र हूँ मैं आज आया हूँ तेरे समीप मौसी ही की ममता प्रसाद देना नर्मदे।।
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जब हमारे ही हम से टूट गए। हम से मजबूत ग़म से टूट गए।। मयकदे के वजू का देख असर रिश्ते दैरो- हरम से टूट गए।। उसका महफ़िल में यूँ अयाँ होना दीन वाले धरम से टूट गए।। फिर तो लज़्ज़त रही न रोज़े की जो सुराही के खम से टूट गए।। इतने नाज़ुक नहीं है हम यारब जो गिरे और धम से टूट गए।। तेरी आँखों को देखकर साक़ी हम हमारी कसम से टूट गए।। आशिक़ी के बहर में उतरे क्यों तुम अगर ज़ेरोबम से टूट गए।। सुरेश साहनी, कानपुर 2021 7 may