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 हैफ़ वसीयत मेरी है पर मैं ही हिस्सेदार नहीं हूँ।।साहनी
 जो भी चाहे कुरेद दे आकर ज़ख़्म इतने नहीं गये गुज़रे।।
 पहले लगता था जीस्त ही सच है अब समझ आया मौत भी सच है ख़्वाब है सब ज़हां अगर प्यारे जो नहीं है तो क्या वही सच है सच है हर ख़्वाब और हक़ीक़त भी जागना सच है नींद भी सच है अपने माशूक पर यकीन नहीं और कहता है आशिक़ी सच है तुम समझते हो सच है पैमाना जाम से बढ़के तिश्नगी सच है ज़िन्दगी झूठ है तुम्हारे बिन साथ तुम हो तो हर घड़ी सच है उसने दावे से झूठ बोला है कैसे कह दें कि साहनी सच है
 सच यही है कि अब कोइ  दरिया  तिश्नगी से भरा नहीं मिलता।।साहनी
 कल एक कविता यद्यपि उसे कविता कहना  कविता की अवमानना होगी परन्तु मैंने उसे  बेहद खूबसूरत कविता कहा क्योंकि मुझे पता है वह उस कविता से भी बेकार और निम्न स्तरीय मेरी कविताओं की सराहना करता है और कहता है लाजवाब!!! सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 शौक़ से देख आजमा के मुझे। ज़ुल्म से ज़ोर से सता के मुझे।। कुछ तो तुझमें अलग है औरों से तेरे नख़रे लगे बला के मुझे।। बेवज़ह और याद आऊँगा क्या करोगे सनम भुला के मुझे।। मोम हूँ संगदिल नहीं फिर भी देख लो देवता बना के मुझे।। ज़िन्दगी दम ब दम न रूठा कर मौत ले जाये ना मना के मुझे।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 याचना स्वीकार मेरी प्राण तुमसे हो न पायी तुम कहाँ वन वन भटकती सो महल में जा समाई।। जानकी तुम क्या ही होती राम मैं भी हो न पाया और योगी सम लखन निष्काम मैं भी हो न पाया रक्षवृत्तीय हो चुकी हैं अर्थयुग में कामनाएं अब श्रवण किसके भला सुनते हैं निर्धन की दुहाई।।.... देखना दृग कन्त के अरु कन्त पद अनुसरण करना सात जन्मों तक निभाना साथ जिसका वरण करना मैं यही आदर्श लेकर आज एकाकी खड़ा हूँ तुम समय के साथ हो इसमें भला कैसी बुराई।। .....