ठीक है हुस्न का निज़ाम रहे इश्क़ का भी मगर मक़ाम रहे अहले-दौलत की सुबहो-शाम रहे अहले -दिल का भी एहतराम रहे प्यास सहराओं में भी बुझती है तेरे सागर में कुछ तो जाम रहे जबकि जन्नत में चश्मे-कौसर है कुछ तो दोज़ख में इंतिज़ाम रहे नफ़रतों से ज़हां नहीं चलता इश्क़ का क्यों न इंसिराम रहे जावेदानी है इश्क़ की फितरत हुस्न में क्यों न फिर दवाम रहे तेरे मयकश की आरज़ू क्या है उम्र भर गर्दिशे-मुदाम रहे साहनी को पढ़ा करो दिल से क्या पता कल उसी का नाम रहे इंसिराम/प्रशासन, जावेदानी/अमरता दवाम/नित्यता गर्दिशे -मुदाम/शराब घर आना जाना सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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चलो बड़े हो बने रहो सर। ठूंठ के जैसे तने रहो सर।। फिर गरीब की लुटिया थारी जब तक ना बिक जाए सारी तब तक ज़िद पर ठने रहो सर।। जितना जनता से ले पाओ पूंजीपतियों को दे जाओ जनता के झुनझुने रहो सर।। जनता सब कुछ सह सकती है धर्म बिना कब रह सकती है हरदम खाई खने रहो सर!! कोरी नैतिकता क्या होगी थोथी मानवता क्या होगी राजनीति में घने रहो सर!! सुरेश साहनी कानपुर
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सुनो हम तुम्हें पढ़ाना चाहते हैं नहीं किताब कॉपी वाली पढ़ाई नहीं उस पढ़ाई से तुम बिगड़ चुके हो क्योंकि जब तुम कहते हो , तुम्हें मानव मात्र से प्यार है तो दुख होता है कि कैसे सीख गए तुम प्यार करना आख़िर हम जहां रहते हैं वहां प्रेम अपराध ही तो है तो हम तुम्हें पढ़ाएंगे कि कैसे की जाती है नफरत कैसे हो सकता है एक धर्म दूसरे धर्म का का सनातन शत्रु कैसे कर सकते हो सफल घृणा उनके प्रति जिन्होंने हेरोदस की संतानों को सदियों तक दबाकर रखा और कैसे नहीं मिला हेलेना को राजमाता का पद अगली दस पीढ़ी तक तुम्हें आने चाहिए नफरतों के गुणा भाग पता होना चाहिए नफरतों का इतिहास भूगोल और पता होना चाहिए कि तुम्हारे माता पिता तुम्हारी ज़िन्दगी बिगाड़ रहें हैं पढा लिखा कर उस एक डिग्री के लिए जिसके बगैर भी तुम जी सकते हो ज़िन्दगी और कर सकते हो नफरत जितनी चाहे उतनी वह नफरत जो सनातन है नफरत करने के लिए पढ़ना ज़रूरी नहीं जबकि प्रेम के लिए ढाई अक्षर पढ़ना पहली शर्त है।। सुरेश साहनी, कानपुर #highlight