सुनो हम तुम्हें पढ़ाना चाहते हैं नहीं किताब कॉपी वाली पढ़ाई नहीं उस पढ़ाई से तुम बिगड़ चुके हो क्योंकि जब तुम कहते हो , तुम्हें मानव मात्र से प्यार है तो दुख होता है कि कैसे सीख गए तुम प्यार करना आख़िर हम जहां रहते हैं वहां प्रेम अपराध ही तो है तो हम तुम्हें पढ़ाएंगे कि कैसे की जाती है नफरत कैसे हो सकता है एक धर्म दूसरे धर्म का का सनातन शत्रु कैसे कर सकते हो सफल घृणा उनके प्रति जिन्होंने हेरोदस की संतानों को सदियों तक दबाकर रखा और कैसे नहीं मिला हेलेना को राजमाता का पद अगली दस पीढ़ी तक तुम्हें आने चाहिए नफरतों के गुणा भाग पता होना चाहिए नफरतों का इतिहास भूगोल और पता होना चाहिए कि तुम्हारे माता पिता तुम्हारी ज़िन्दगी बिगाड़ रहें हैं पढा लिखा कर उस एक डिग्री के लिए जिसके बगैर भी तुम जी सकते हो ज़िन्दगी और कर सकते हो नफरत जितनी चाहे उतनी वह नफरत जो सनातन है नफरत करने के लिए पढ़ना ज़रूरी नहीं जबकि प्रेम के लिए ढाई अक्षर पढ़ना पहली शर्त है।। सुरेश साहनी, कानपुर #highlight
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दूर रहते हुये ही मिल लेना। कुछ झिझकते हुए ही मिल लेना। दिन निकलते हुये ही मिल लेना। शाम ढलते हुये ही मिल लेना।। तुमसे करने हैं कुछ सवाल मुझे नफ़्स रहते हुये ही मिल लेना।। मिल न पाये उरूज़ के दौरान ख़ैर ढलते हुये ही मिल लेना।। रात तुम नींद से रहे बोझिल आँख मलते हुए ही मिल लेना।। रुक के शायद कभी न मिल पाओ तुम टहलते हुये ही मिल लेना।। वस्लो-फुरक़त कि अब किसे परवाह पर न मिलते हुये ही मिल लेना।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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क्या कहा हम भी यार थे उनके सब तो उम्मीदवार थे उनके हम भी थे हुस्न के असीरों में पर न बीमार- वार थे उनके एक हम आशना रहे तो क्या यूँ तो आशिक़ हज़ार थे उनके ख़ूब चर्चे थे दौरे कालेज में हर तरफ़ इश्तेहार थे उनके हुस्न तो बेपनाह था उन पर हर तरफ जाँनिसार थे उनके तब खिज़ां का उन्हें ख़याल न था क्या गुमाने-बहार थे उनके आज कतरा रहे हो मिलने से कल बड़े ग़मगुसार थे उनके सुरेश साहनी कानपुर 9451545132