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 वो नीम की सन्टी से तशरीफ़ उधड़ जाना स्कूल न था गोया दहशत का इदारा था।।साहनी
 तीरगी अपनी करके हवाले मेरे। मुझसे हर ले गया वो उजाले मेरे।। कब मुअज्जम ने आने दिया बाम पर खाक़ सुनते ख़ुदाबन्द नाले मेरे।। सब है अपने समझना बड़ी भूल थी घर न मेरा न मस्जिद शिवाले मेरे।। मंजिलों मरहलों में बदलती रहीं बस निशानी हैं पावों के छाले मेरे।।  बढ़ चुका हूँ मैं आगे तेरी सोच से अब तो रस्ते के पत्थर हटा ले मेरे।। साहनी सुरेश, कानपुर 9451545132
 आदमखोरों की तादाद कहीं ज़्यादा है क्या होगा कुछ अदद भेड़ियों के मरने से।।साहनी
 वहीं लोग मंचों पे छाये मिले हैं।  जो ग़ैरों की नज़्म चुराये मिले हैं।। बताते हैं दुबई की फ्लाइट है उनकी टिकट गांव का पर कटाये मिले हैं।।साहनी
 क्या कोई रोशनी सम्हाले अब। तीरगी है मेरे हवाले अब। फ़िक़्र रहबर को सिर्फ़ अपनी है अपनी उम्मत को कौन पाले अब।।
 कसमसाती रही हया फिर भी। मिन्नतें की नहीं सुना फिर भी।। लोग करते रहे दुआ फिर भी। काम आया नहीं ख़ुदा फिर भी।। यूँ तो कुछ भी नहीं हुआ फिर भी। सब ने क्या क्या नहीं कहा फिर भी।। संग जलती रही शमा फिर भी। सब समझते रहे अदा फिर भी।। कोई सानी नहीं मिला फिर भी। मेरा उला पढा गया फिर भी।। साहनी सुरेश कानपुर
 चलो मान लेते हैं तुमने नहीं जलाया उसे उसने ही छिड़का ख़ुद पर पेट्रोल और कर दिया स्वयं को आग के हवाले बिलकुल उसी तरह जैसे उसके पिता ने सौंपा था  तुम्हारे हाथ में उसका हाथ और सौंप दिया था अपना सर्वस्व अपनी आंखों की पुतली अपने कलेजे का टुकड़ा और ढेर सारा दहेज भी  कुछ उसी तरह जैसे उस नव परिणिता ने कर दिया तुम्हारे हवाले अपनी लाज अपना प्रेम और अपनी निजता भी यानि कि अपना सर्वस्व उस रात जब तुम हुए थे  अपनी दशकों की प्यास से तृप्त उसे प्रेम की प्यास से अतृप्त छोड़कर फिर धीरे धीरे तुम दिखाने लगे अपना रूप अपनी तृष्णा अपनी हवस और अपना असली रंग तुमने कहाँ जलाया सिर्फ़ माँगा थोड़े से रुपये यही कोई पचीस तीस लाख थोड़ा सा सामान जैसे ब्रांडेड टीवी एसी, वाशिंग मशीन आदि  आदि और  एक छोटी सी गाड़ी जैसे आउडी या फोरचूनर  और  फरमाइशों के पूरी नहीं होने पर उसके माँ बाप को गालियां देना बात बात पर नाराज़ होना और तुम्हें अर्पित देह की चमड़ी उधेड़ देना  यह तो एक तरीका था तुम्हारे प्यार का इसे जलाना नहीं कहते हैं अब वो तिल तिल कर जले हर रोज तो इसमें तुम्हारा क्या कुसूर? हाँ तुमने न...