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 किस मन की बात सुनें क्या मन की बात करें। सावन में तुम बिन क्या सावन की बात करें।। क्यों इनकी बात करें क्या उनकी बात करें। क्यों ना हम राधा और मोहन की बात करें।। सर्पों से लिपटे ज्यों चंदन की बात करें। विरहानल में जलते दो तन की बात करें। घावों पर मरहम के लेपन की बात करें।। मिश्री सी बात सुनें माखन की बात करें आओ हम राधा और मोहन की बात करें। ग्वालों की गोपियन की गैय्यन की बात करें।। बंशी की धुन पर सुध रीझन की की बात करें गुंजन की बात करें, मधुवन की बात करें।। किस मन से यशुदा के नन्दन की बात करें।। पुष्प पथ में बिछाये हैं रख दो चरण। आपसे स्नेह का है ये पुरश्चरण।।   प्रीति के पर्व का यह अनुष्ठान है दृष्टि का अवनयन लाज सोपान है सत्य सुन्दर की सहमति है शिव अवतरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।। कुछ करो कि स्वयम्वर सही सिद्ध हो सिद्धि हो और रघुवर सही सिद्ध हो शक्ति बन मेरे भुज का करो  प्रिय वरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।।  ओम सत्यम शिवम सुन्दरम प्रीति हो युगयुगान्तर अमर प्रीति की कीर्ति हो लोग उध्दृत करें राम का आचरण।। पुष्प पथ में बिछायें हैं रख दो चरण।।
 वेदने रहो मम अन्तस् में क्या एकाकिनि बन कर जीना पग पग पर साथी हूँ सहचर क्यों सन्यासिनि बन कर जीना हो खंडित शील अहिल्या से बन्धक मन भाव शिलाओं के है वन अशोक में शोकाकुल तन दग्ध विदेह सुताओं के मम उर आश्रय है जब साथी क्या सौदामिनि बन कर जीना.... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 जो मिला उससे ख़ुश नहीं इंसां उससे नाख़ुश है जो मिला ही नहीं।।साहनी
 इश्क़ है इश्क़ दिल्लगी से अलग इश्क़ है आम ज़िन्दगी से अलग इश्क़ से हर किसी को नफ़रत है इश्क़ रहता है हर किसी से अलग इब्ने-इब्लीस तो नहीं आशिक़ कुछ तो है इसमें आदमी से अलग जाति वाले भी फ़र्क़  रखते हैं इश्क़ है हर बिरादरी से अलग शेख़ क्या कुफ़्र है मुहब्बत में इश्क़ में क्या है बन्दगी से अलग साहनी  छोड़ दे कलम या फिर इश्क़ को कर दे शायरी से अलग साहनी सुरेश, कानपुर
 तेरे भी माँ बाप सोचते यदि कुछ ऐसा  क्या तब तू इस दुनिया में आ पाया होता
 जो दमे-इश्क़ भर रहा होगा। कोई अहले-जिगर रहा होगा।। हुस्न बेशक़ उधर रहा होगा। आईना सज सँवर रहा होगा।। राहे-मक़तल चुनी है उल्फ़त ने मौत से खाक़ डर रहा होगा।। यार जैसा जलाल नामुमकिन लाख शम्सो-क़मर रहा होगा।। यूँ कभी हिचकियाँ नहीं आती वो मुझे याद कर रहा होगा।। हम ग़मे-हिज़्र से परीशां हूँ क्या उसे भी अखर रहा होगा।। दिल चुरा ले गया सरेमहफिल उसमें कितना हुनर रहा होगा।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 फिर से वही नादानियाँ करने लगे हैं हम। कुछ भी हो बदगुमानियाँ करने लगे हैं हम।। यूँ बन सँवर के घूमना आईने ढूंढना अपनी ही निगेहबानियाँ  करने लगे हैं हम।।