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 बस चमत्कार पर यकीं करिये। जब भी सरकार पर यकीं करिये।। अपने परिवार  पर यकीं करिये। ना कि संसार  पर यकीं करिये।। दूसरे भी बुरे नहीं लेकिन अपने किरदार  पर यकीं करिये।। अब तो खबरें भी झूठ छपती हैं यूँ न अख़बार  पर यकीं करिये।। आपने भी ज़मीर बेच दिया फिर तो दरबार  पर यकीं करिये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 सुनो हम तुम्हें पढ़ाना चाहते हैं नहीं किताब कॉपी  वाली पढ़ाई नहीं उस पढ़ाई से  तुम बिगड़ चुके हो क्योंकि जब तुम कहते हो ,  तुम्हें मानव मात्र से प्यार है तो दुख होता है कि कैसे सीख गए तुम प्यार करना आख़िर हम जहां रहते हैं वहां प्रेम अपराध ही तो है तो हम तुम्हें पढ़ाएंगे कि कैसे की जाती है नफरत कैसे हो सकता है एक धर्म  दूसरे धर्म का का सनातन शत्रु कैसे कर सकते हो सफल घृणा  उनके प्रति जिन्होंने हेरोदस की संतानों को सदियों तक दबाकर रखा  और कैसे नहीं मिला हेलेना को राजमाता का पद  अगली दस पीढ़ी तक तुम्हें आने चाहिए नफरतों के गुणा भाग पता होना चाहिए नफरतों का इतिहास भूगोल और पता होना चाहिए कि तुम्हारे माता पिता तुम्हारी ज़िन्दगी बिगाड़ रहें हैं पढा लिखा कर उस एक डिग्री के लिए जिसके बगैर भी तुम जी सकते हो ज़िन्दगी और कर सकते हो  नफरत जितनी चाहे उतनी वह नफरत जो सनातन है नफरत करने के लिए  पढ़ना  ज़रूरी नहीं जबकि प्रेम के लिए ढाई अक्षर पढ़ना पहली शर्त है।। सुरेश साहनी, कानपुर #highlight
 भावों में शुचिता रखते तो प्रेम हमारा पावन होता अक्षुण्ण होती नेह वर्तिका सतसम्बन्ध सनातन होता
 दूर रहते हुये ही मिल लेना। कुछ झिझकते हुए ही मिल लेना।  दिन निकलते हुये ही मिल लेना। शाम ढलते हुये ही मिल लेना।। तुमसे करने हैं कुछ सवाल मुझे नफ़्स रहते हुये ही मिल लेना।। मिल न पाये उरूज़ के दौरान ख़ैर ढलते  हुये ही मिल लेना।। रात तुम नींद से रहे बोझिल आँख मलते हुए ही मिल लेना।। रुक के शायद कभी न मिल पाओ तुम टहलते हुये ही मिल लेना।। वस्लो-फुरक़त कि अब किसे परवाह पर न मिलते हुये ही मिल लेना।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 क्या कहा हम भी  यार थे  उनके सब तो उम्मीदवार थे उनके हम भी थे हुस्न के असीरों में पर न बीमार- वार थे उनके एक हम आशना रहे तो क्या  यूँ तो आशिक़ हज़ार थे उनके ख़ूब चर्चे थे दौरे कालेज में हर तरफ़ इश्तेहार थे उनके हुस्न तो बेपनाह था उन पर हर तरफ जाँनिसार थे उनके तब खिज़ां का उन्हें ख़याल न था क्या गुमाने-बहार थे उनके आज कतरा रहे हो मिलने से कल बड़े ग़मगुसार थे उनके सुरेश साहनी कानपुर  9451545132
 यारों की कमज़र्फ़ी है तस्लीम मगर दुश्मन हो ख़ुद्दार हमेशा ध्यान रहे।।साहनी
 कैसे कह दें कि हम रहे तन्हा कौन मानेगा ग़म रहे तन्हा हम थे मज़लूम भीड़ का हिस्सा वो थे करके सितम रहे तन्हा जो थे अहले यक़ीन साथ रहे सिर्फ़ अहले-वहम रहे तन्हा भीड़ के बाद भी न जाने क्यों पत्थरों के सनम रहे तन्हा मयकदे में हमें सुकून तो है कौन जाकर अदम रहे तन्हा सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132