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 कैसे कह दें कि हम रहे तन्हा कौन मानेगा ग़म रहे तन्हा हम थे मज़लूम भीड़ का हिस्सा वो थे करके सितम रहे तन्हा जो थे अहले यक़ीन साथ रहे सिर्फ़ अहले-वहम रहे तन्हा भीड़ के बाद भी न जाने क्यों पत्थरों के सनम रहे तन्हा मयकदे में हमें सुकून तो है कौन जाकर अदम रहे तन्हा सुरेश साहनी, कानपुर 9451545132
 बेशक़ है दिल्ली रजधानी है अपनी फिर भी अनजानी वैसे बहुतेरे अपने है फिर क्यों है इतनी बेगानी रोज कथा घर एक बसा कर रोज उजड़ती एक कहानी यहाँ झोंपड़ी पर चलती है हवसी महलों की मनमानी बचना इन नादिरशाहों से ठहरा देंगे पाकिस्तानी फिर फिर दिल्ली क्यों आता है यह सुरेश करने नादानी.
 तन से बाहर तो निकालें ख़ुद को और आईना बना लें ख़ुद को गर्द जो तन पे है धूल जायेगी क्यों ना अन्दर से खंगालें ख़ुद को साहनी
 फागुनी अंगड़ाईयों के दिन गये सावनी पुरवाईयों के दिन गये अब कहाँ वो मस्तियाँ मदहोशियां बेवज़ह रुसवाईयों के दिन गये फाग कजरी और सोहर गुम हुये गूँजती अंगनायियों के दिन गये तीर नज़रें और मेरा सांवरा हाय उन हरजाईयों के दिन गये आ चुका है यार मेरा वज़्म में साहनी तन्हाइयों के दिन गये
 और किसको मलाल है मुझसे आज मेरा सवाल है मुझसे पाल बैठा हूँ ये ग़लतफ़हमी हर उरुज़ो-,जवाल है मुझसे मेरा होना है वक़्त का होना रात दिन माहो साल है मुझसे ग़म तेरे आज भी  यतीम नहीं दर्द की देखभाल है मुझसे रात भर मैं ही मुझसे उलझा हूँ जिस्म मेरा निढाल है मुझसे मैं ज़माने की लय समझता हूं पर ज़माने की ताल है मुझसे जाने कितने असीर हैं मेरे साहनी तक निहाल है मुझसे सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 स्वयं से युद्ध शिव तक ले चलेगा सदाचर बुद्ध शिव तक ले चलेगा हमारा मन हो शिव संकल्प वाला यही मन शुद्ध शिव तक ले चलेगा अभी तक इंद्रियों के वश में है मन करो अनिरुद्ध शिव तक ले चलेगा तुम्हारा क्रोध शिवता का क्षरण है न होना क्रुद्ध शिव तक ले चलेगा सहजतः योग से मन वृत्तियों को करोगे रुद्ध शिव तक ले चलेगा सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 मुझे आना था आ पहुंचा यहाँ पर। मुक़द्दर रह गया जाने कहाँ पर।। दुआ थी टूटते तारे से करनी निगाहें थीं तुम्हारी कहकशाँ पर।। ज़मीं पर तुमको रहना तो कहते किसी का घर बना कब आसमां पर।। दराजेगा तुम्हारी उम्र मौला करम तो कर कभी इस नीम-जाँ पर।। किसी सय्याद पर माइल हो शायद तभी तो तोहमतें हैं बाग़वां पर।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132