वेदने रहो मम अन्तस् में क्या एकाकिनि बन कर जीना पग पग पर साथी हूँ सहचर क्यों सन्यासिनि बन कर जीना हो खंडित शील अहिल्या से बन्धक मन भाव शिलाओं के है वन अशोक में शोकाकुल तन दग्ध विदेह सुताओं के मम उर आश्रय है जब साथी क्या सौदामिनि बन कर जीना.... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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इश्क़ है इश्क़ दिल्लगी से अलग इश्क़ है आम ज़िन्दगी से अलग इश्क़ से हर किसी को नफ़रत है इश्क़ रहता है हर किसी से अलग इब्ने-इब्लीस तो नहीं आशिक़ कुछ तो है इसमें आदमी से अलग जाति वाले भी फ़र्क़ रखते हैं इश्क़ है हर बिरादरी से अलग शेख़ क्या कुफ़्र है मुहब्बत में इश्क़ में क्या है बन्दगी से अलग साहनी छोड़ दे कलम या फिर इश्क़ को कर दे शायरी से अलग साहनी सुरेश, कानपुर
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जो दमे-इश्क़ भर रहा होगा। कोई अहले-जिगर रहा होगा।। हुस्न बेशक़ उधर रहा होगा। आईना सज सँवर रहा होगा।। राहे-मक़तल चुनी है उल्फ़त ने मौत से खाक़ डर रहा होगा।। यार जैसा जलाल नामुमकिन लाख शम्सो-क़मर रहा होगा।। यूँ कभी हिचकियाँ नहीं आती वो मुझे याद कर रहा होगा।। हम ग़मे-हिज़्र से परीशां हूँ क्या उसे भी अखर रहा होगा।। दिल चुरा ले गया सरेमहफिल उसमें कितना हुनर रहा होगा।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132