नाविक ले चल पार नदी के मन्थर मन्थर नाव डुलाते। उस तट पर कुछ मनहर मनहर मीठी मीठी तान सुनाते।। नाविक ले चल..... लहर लहर को छेड़ रही है भँवर द्वेषवश घूम रहा है बचना दूर उधर प्रणायकुल चाँद नदी को चूम रहा है नदी नियंत्रण न खो बैठे अपने तट तक आते आते।। नाविक ले चल....... अभी देखने हैं जीवन के रंग रूपहरे और सुनहरे स्मृतियों के अग्रदूत का सम्मेंलित स्वरूप फिर उभरे घड़ियां मधुर मिलन की बीतें भरते स्मृतियों के खाते।। नाविक ले चल.... सहज दुरूह परिस्थितियों में वातों में झंझावातों में सुख में दुःख में समस्थिति में आघातों में प्रतिघातों में हम तुम संग रहेंगे हिलमिल चलो यहीं हैं नीड़ बनाते।। नाविक ले चल..... सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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आपकी बेपर्दगी की बात जाने दीजिये। छोड़िये शर्मिंदगी की बात जाने दीजिये।। हुस्न उनका पा चुका है अब जवालों का उरूज़ इश्क़ के दीवानगी की बात जाने दीजिये।। जबकि दरियाओं की गहराई से हम दो चार हैं उस ज़ुनूने-तिश्नगी की बात जाने दीजिये।। कम से कम इस उम्र में तो दिल्लगी अच्छी नहीं आप और संजीदगी की बात जाने दीजिये।। मर चुकी हैं हसरतें चाहत ख़यालो-ख़्वाब सब अब हमारी ज़िन्दगी की बात जाने दीजिये।। सुरेश साहनी,कानपुर 9451545132
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हम अगर हम से मिल नहीं पाये। तुम भी तो तुम से मिल नहीं पाए।। लज़्ज़ते-ग़म है इश्क़ की ऐसी हम किसी ग़म से मिल नहीं पाये।। हम अना में पहुँच के बामे-अदम यूँ गिरे धम से मिल नहीं पाये।। आशना होके कब मिले तुम भी हम भी हमदम से मिल नहीं पाये।। ताब-ए-तिश्नगी रही इतनी होठ शबनम से मिल नहीं पाये।। इश्क़ की मय तलब में थी लेकिन हुस्न के खम से मिल नहीं पाये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
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नाम से हम फ़क़ीर हैं समझे? धनकुबेरों की पीर हैं समझे।। हमपे लाखों का कर्ज़ है यारों हम बहुत ही अमीर हैं समझे? जितने बदहाल हैं भिखारी हैं सब हमारे असीर हैं समझे? अब है कानून अपनी मुट्ठी में हर तरह हम क़दीर हैं समझे? कौन सा दीन कौन सा मज़हब हम तो ज़र के पज़ीर हैं समझे? असीर/बंधक क़दीर/समर्थ, नियंत्रण करने वाले ज़र/ दौलत पज़ीर/समर्थक, मानने वाले सुरेश साहनी कानपुर 9451545132