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 जब हमारे ही हम से टूट गए। हम से मजबूत ग़म से टूट गए।। मयकदे के वजू का देख असर रिश्ते दैरो- हरम से टूट गए।। उसका महफ़िल में यूँ अयाँ होना दीन वाले धरम से टूट गए।। फिर तो लज़्ज़त रही न रोज़े की जो सुराही के खम से टूट गए।। इतने नाज़ुक नहीं है हम यारब जो गिरे और धम से टूट गए।। तेरी आँखों को देखकर साक़ी हम हमारी कसम से टूट गए।। आशिक़ी के बहर में उतरे क्यों तुम अगर ज़ेरोबम से टूट गए।। सुरेश साहनी, कानपुर 2021 7 may
 क्या कहा हौलनाक है ही नहीं। इस से बढ़कर मज़ाक है ही नहीं।। इश्क़ को इत्तेफ़ाक़ जायज़ है हुस्न को इत्तेफाक है ही नहीं।। हुस्न परदा करे करे ना करे इश्क़ पर झाँक-ताक है ही नहीं।। आशिक़ी क्यों न हो तेरी ख़ारिज तू गिरेबान चाक़ है ही नहीं।। साहनी तुझ को होश है अब तक तू मिरा इश्तियाक़ है ही नहीं।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 खुशी के पल सँजोना चाहती है। तमन्ना हँस के रोना चाहती है।। फलक बेशक़ जगाना चाहता हो ज़मीं भर नींद सोना चाहती है।। उसे मुझ से मुहब्बत खाक़ होगी वो नादाँ है खिलौना चाहती है।। थकी जाती है फिर भी ज़िंदगानी खुद अपनी लाश ढोना चाहती है।। मुहब्बत में मेरी हस्ती बिखर कर सरापा नूर होना चाहती है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 हक़ में उठती आवाज़ों पर पहरा देता है। ये मज़लूमों को अपराधी ठहरा देता है।।
 शिद्दत से तेरे ख़्वाब संजोये भी नहीं हैं। क्या खाक़ हँसें ख़ुद पे तो रोये भी नहीं हैं।। डर है कि तेरे ख़्वाब परेशान न कर दें क्या जागें अभी ठीक से सोये भी नहीं हैं।।
 उसने क्यों तर है मेरा रुमाल नहीं पूछा। ख़ूब पता है क्यों उसने अहवाल नहीं पूछा।। क्या पत्थर से शिकवा करते जब आईने ने देखा समझा फिर भी मेरा हाल नहीं पूछा।।
 पद पर जब तक रहे घूमते फिरते थे अकड़े। सोच रहे हैं अब भी दुनिया उनके पैर पड़े।। नहैं किसी से रामरहारी दुआ सलाम नहीं उससे सीधे मुँह ना बोले जिससे काम नहीं अपने मातहतों के सिर पर हरदम रहे खड़े।। क्या मजाल थी कोई काम के लिये उन्हें टोके हाँ टेबल के नीचे वाले काम नहीं रोके कम वेतन में आमदनी के स्रोत मिले तगड़े।। अफसर थे तो कदम कदम पर सेवा टहल रही आज नहीं हैं ठसक अफसरी फिर भी मचल रही आज मेम भी सोच रही हैं कौन धुले कपड़े।। सुरेश साहनी कानपुर रिटायर 9451545132