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 क्या कभी मैं भी इतना अच्छा था। या तुम्हारी नज़र का धोखा था।। इसमें रुसवाईयाँ हैं ग़म भी है सच बताना कभी ये सोचा था।।साहनी
 क्यों भटकता तेरी राहों में रहूं। गिर के क्यों ख़ुद की निगाहों में रहूं।।  क्यों फिरूँ गलियों में तेरी बावला क्यों न अपनी ही पनाहों में रहूं।।साहनी
 वो हमारे सनम नहीं थे जब क्या नहीं था कि हम नहीं थे जब उस ख़ुदा का कहाँ ठिकाना था इतने दैरोहरम नहीं थे जब।। तब वो जन्नत ज़मीन पर थी क्या पंथ मज़हब धरम नहीं थे जब।। पीने वाले कहाँ थे दुनिया में तब सुराही के खम नहीं थे जब।। इश्क़ होगा ये मान लें कैसे तेरी दुनिया में ग़म नहीं थे जब।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 यूँ भी आतिश पनाह होना है। एक दिन सब तबाह होना है।। हुस्न काजल की कोठरी ठहरा साफ दामन सियाह होना है।। क्या करेगा निगाह शाइस्ता क्या तुझे बदनिगाह होना है।। अब नवाजा है मेरे मुर्शिद ने घर मिरा ख़ानक़ाह होना है।। जिस के सिर पर हो हाथ संजर का एकदिन उसको शाह होना है।। आशिक़ी और फिर ग़ज़लगोई साहनी को तबाह होना है।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 गली घर द्वार में उलझा हुआ हूँ। अभी परिवार में उलझा हुआ हूँ।। ये जीवन नून लकड़ी तेल है क्या जहाँ बेकार में उलझा हुआ हूँ।। किसी को जीत कर भी क्या करूँगा मैं अपनी हार में उलझा हुआ हूँ।। बहुत सुंदर है ये मलमूत्र का घर इसी आगार में उलझा हुआ हूँ।। निकल पाता तो मिलता मृत्यु से भी अभी दस द्वार में उलझा हुआ हूँ।। न आएगी सुबह मधुयामिनी की अभी अभिसार में उलझा हुआ हूँ।।
 नये कपड़े पहन कर बदगुमानी कम अज़ कम उठ के मिलना चाहिए था।।   चला है चार कंधों पर अकड़ कर जिसे ख़ुद झुक के चलना चाहिये था।।
 क्या वो इस तरह परेशान करेगा मुझको। प्यार करने को कहेगा न करेगा मुझको।। देख लेगा भी तो कतरा के निकल जायेगा अजनबी बन के वो हैरान करेगा मुझको।।साहनी