चाहते सब हैं हम सुधर जायें
पर बताते नहीं किधर जायें
कुछ का मन है कि हम उधर जायें
आप कहते हैं हम इधर जायें
क्या युवाओं का है कोई साहिल
या कि दरिया में हम उतर जायें
पाँव लटके हैं कब्र में उनके
किसलिए नौनिहाल मर जायें
मंज़िलें चल पड़ी हैं सिम्ते-सफ़र
हम कहाँ किस तरह ठहर जायें
सुरेश साहनी, कानपुर
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