मुझे आना था आ पहुंचा यहाँ पर।

मुक़द्दर रह गया जाने कहाँ पर।।


दुआ थी टूटते तारे से करनी

निगाहें थीं तुम्हारी कहकशाँ पर।।


ज़मीं पर तुमको रहना तो कहते

किसी का घर बना कब आसमां पर।।


दराजेगा तुम्हारी उम्र मौला

करम तो कर कभी इस नीम-जाँ पर।।


किसी सय्याद पर माइल हो शायद

तभी तो तोहमतें हैं बाग़वां पर।।


सुरेश साहनी कानपुर

9451545132

Comments