वेद कहे भगवान का है अव्यक्त सरूप।
ये कहते जो हम कहें पूजो वह ही रूप।।
एक तुम्हारे राम हैं एक हमारे राम।
घट घट व्यापी राम पर काहे का संग्राम।।
एक शुद्र ने कर लिया हरि का कीरत गान।
क्या इतने से हो गये कलिमलीन भगवान।।
उस प्रभु की क्या जाति है क्या है उसका धर्म।
क्यों लड़ते हैं लोग जब नहीं जानते मर्म।।
समदर्शी बन बांटता सर्दी बारिश धूप।
और यहां हर जाति के अपने अपने कूप।।
आज देश को दीजिये सौ टुकड़ों में तोड़।
कल घट कर रह जायेंगे चिन्तक चंद करोड़।।
सुरेश साहनी कानपुर
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