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Showing posts from August, 2026
 क्या कोई रोशनी सम्हाले अब। तीरगी है मेरे हवाले अब। फ़िक़्र रहबर को सिर्फ़ अपनी है अपनी उम्मत को कौन पाले अब।।
 कसमसाती रही हया फिर भी। मिन्नतें की नहीं सुना फिर भी।। लोग करते रहे दुआ फिर भी। काम आया नहीं ख़ुदा फिर भी।। यूँ तो कुछ भी नहीं हुआ फिर भी। सब ने क्या क्या नहीं कहा फिर भी।। संग जलती रही शमा फिर भी। सब समझते रहे अदा फिर भी।। कोई सानी नहीं मिला फिर भी। मेरा उला पढा गया फिर भी।। साहनी सुरेश कानपुर
 चलो मान लेते हैं तुमने नहीं जलाया उसे उसने ही छिड़का ख़ुद पर पेट्रोल और कर दिया स्वयं को आग के हवाले बिलकुल उसी तरह जैसे उसके पिता ने सौंपा था  तुम्हारे हाथ में उसका हाथ और सौंप दिया था अपना सर्वस्व अपनी आंखों की पुतली अपने कलेजे का टुकड़ा और ढेर सारा दहेज भी  कुछ उसी तरह जैसे उस नव परिणिता ने कर दिया तुम्हारे हवाले अपनी लाज अपना प्रेम और अपनी निजता भी यानि कि अपना सर्वस्व उस रात जब तुम हुए थे  अपनी दशकों की प्यास से तृप्त उसे प्रेम की प्यास से अतृप्त छोड़कर फिर धीरे धीरे तुम दिखाने लगे अपना रूप अपनी तृष्णा अपनी हवस और अपना असली रंग तुमने कहाँ जलाया सिर्फ़ माँगा थोड़े से रुपये यही कोई पचीस तीस लाख थोड़ा सा सामान जैसे ब्रांडेड टीवी एसी, वाशिंग मशीन आदि  आदि और  एक छोटी सी गाड़ी जैसे आउडी या फोरचूनर  और  फरमाइशों के पूरी नहीं होने पर उसके माँ बाप को गालियां देना बात बात पर नाराज़ होना और तुम्हें अर्पित देह की चमड़ी उधेड़ देना  यह तो एक तरीका था तुम्हारे प्यार का इसे जलाना नहीं कहते हैं अब वो तिल तिल कर जले हर रोज तो इसमें तुम्हारा क्या कुसूर? हाँ तुमने न...
 ठीक है हुस्न का निज़ाम रहे इश्क़ का भी मगर मक़ाम रहे अहले-दौलत की सुबहो-शाम रहे अहले -दिल का भी एहतराम रहे प्यास सहराओं में भी बुझती है तेरे सागर में कुछ तो जाम रहे जबकि जन्नत में चश्मे-कौसर है कुछ तो दोज़ख में इंतिज़ाम रहे नफ़रतों से ज़हां नहीं चलता इश्क़ का क्यों न इंसिराम रहे जावेदानी है इश्क़ की फितरत हुस्न में क्यों न फिर दवाम रहे तेरे मयकश की आरज़ू क्या है उम्र भर गर्दिशे-मुदाम रहे साहनी को पढ़ा करो दिल से क्या पता कल उसी का नाम रहे इंसिराम/प्रशासन, जावेदानी/अमरता दवाम/नित्यता गर्दिशे -मुदाम/शराब घर  आना जाना सुरेश साहनी कानपुर 9451545132
 ज़ख़्म दिलों के भरने वाले कम ही हैं। इश्क़ में जीने मरने वाले कम ही हैं।। सब कहते हैं तुम पर जान लुटा देंगे सच में ऐसा करने वाले कम ही हैं।।साहनी
 चलो बड़े हो बने रहो सर। ठूंठ के जैसे तने रहो सर।। फिर गरीब की लुटिया थारी जब तक ना बिक जाए सारी तब तक ज़िद पर ठने रहो सर।। जितना जनता से ले पाओ पूंजीपतियों को दे जाओ जनता के झुनझुने रहो सर।। जनता सब कुछ सह सकती है धर्म बिना कब रह सकती है हरदम खाई खने रहो सर!! कोरी नैतिकता क्या होगी थोथी मानवता क्या होगी राजनीति में घने रहो सर!! सुरेश साहनी कानपुर
 आम नागरिक को सदा सत्ता करती ट्रोल। दे कर राम रहीम को चौदहवां पैरोल।।साहनी दोहा
 हमें लगता हैं हम मेहमाँ नहीं हैं ये हैरानी है हम  हैरां नहीं हैं कई तरहें हैं रहती ज़िन्दगी की बशर रहना बहुत आसां नहीं है -साहनी
 बस चमत्कार पर यकीं करिये। जब भी सरकार पर यकीं करिये।। अपने परिवार  पर यकीं करिये। ना कि संसार  पर यकीं करिये।। दूसरे भी बुरे नहीं लेकिन अपने किरदार  पर यकीं करिये।। अब तो खबरें भी झूठ छपती हैं यूँ न अख़बार  पर यकीं करिये।। आपने भी ज़मीर बेच दिया फिर तो दरबार  पर यकीं करिये।। सुरेश साहनी कानपुर 9451545132