कसमसाती रही हया फिर भी।

मिन्नतें की नहीं सुना फिर भी।।


लोग करते रहे दुआ फिर भी।

काम आया नहीं ख़ुदा फिर भी।।


यूँ तो कुछ भी नहीं हुआ फिर भी।

सब ने क्या क्या नहीं कहा फिर भी।।


संग जलती रही शमा फिर भी।

सब समझते रहे अदा फिर भी।।


कोई सानी नहीं मिला फिर भी।

मेरा उला पढा गया फिर भी।।


साहनी सुरेश कानपुर

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