ठीक है हुस्न का निज़ाम रहे
इश्क़ का भी मगर मक़ाम रहे
अहले-दौलत की सुबहो-शाम रहे
अहले -दिल का भी एहतराम रहे
प्यास सहराओं में भी बुझती है
तेरे सागर में कुछ तो जाम रहे
जबकि जन्नत में चश्मे-कौसर है
कुछ तो दोज़ख में इंतिज़ाम रहे
नफ़रतों से ज़हां नहीं चलता
इश्क़ का क्यों न इंसिराम रहे
जावेदानी है इश्क़ की फितरत
हुस्न में क्यों न फिर दवाम रहे
तेरे मयकश की आरज़ू क्या है
उम्र भर गर्दिशे-मुदाम रहे
साहनी को पढ़ा करो दिल से
क्या पता कल उसी का नाम रहे
इंसिराम/प्रशासन, जावेदानी/अमरता
दवाम/नित्यता
गर्दिशे -मुदाम/शराब घर आना जाना
सुरेश साहनी कानपुर
9451545132
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