बेशक़ है दिल्ली रजधानी

है अपनी फिर भी अनजानी


वैसे बहुतेरे अपने है

फिर क्यों है इतनी बेगानी


रोज कथा घर एक बसा कर

रोज उजड़ती एक कहानी


यहाँ झोंपड़ी पर चलती है

हवसी महलों की मनमानी


बचना इन नादिरशाहों से

ठहरा देंगे पाकिस्तानी


फिर फिर दिल्ली क्यों आता है

यह सुरेश करने नादानी.

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