रात का कब पता चला मुझको।
दिन भटकता हुआ मिला मुझको।।
रात आयी थी चाँदनी पहने
दिन दिखा भी तो बरहना मुझको।।
ग़ैर अपनों से बढ़ के काम आये
जब सगे दे गये दगा मुझको।।
आदमी ने ख़ुदा बनाया है
ख़ुद बता कर गया ख़ुदा मुझको।।
जाने किसकी तलाश में था सुरेश
ख़ैर मैं ढूंढ़ता रहा मुझको।।
सुरेश साहनी कानपुर
9451545132
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