नाविक ले चल पार नदी के

मन्थर मन्थर नाव डुलाते।

उस तट पर कुछ मनहर मनहर

मीठी मीठी तान सुनाते।।

नाविक ले चल.....


लहर लहर को छेड़ रही है

भँवर द्वेषवश घूम रहा है

बचना दूर उधर प्रणायकुल

चाँद नदी को चूम रहा है


नदी नियंत्रण न खो बैठे

अपने तट तक आते आते।।

नाविक ले चल.......


अभी देखने हैं जीवन के

रंग रूपहरे और सुनहरे

स्मृतियों के अग्रदूत का

सम्मेंलित स्वरूप फिर उभरे


घड़ियां मधुर मिलन की बीतें

भरते स्मृतियों के खाते।।

नाविक ले चल....


सहज दुरूह परिस्थितियों में

वातों में झंझावातों में

सुख में दुःख में समस्थिति में

आघातों में प्रतिघातों में


हम तुम संग रहेंगे हिलमिल

 चलो यहीं हैं नीड़ बनाते।।

नाविक ले चल.....

सुरेश साहनी कानपुर

9451545132

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