ज़िन्दगी क्या है मुसलसल इक सफ़र।
मौत क्या है बस बदलना रहगुज़र।।
ज़िंदगी है चार दिन का इक ठहर।
मौत है फिर से शुरूआते-सफ़र।।
आम हो या ख़ास कोई भी बशर।
एक दिन जाना है सबको छोड़ कर।।
जिस्म है केवल किराए का मकान
लाख हम दावा करें अपना है घर।।
हो तवाज़ुन में तुम्हारे पुल-सिरात
साहनी अब आकिबत की फ़िक्र कर।।
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