मैंने एनसीआर में अधिवास करने वाले एक कवि साथी से चर्चा की। मेरी इच्छा थी कि भारत की साहित्यिक राजधानी में एक काव्य कलरव कार्यक्रम का आयोजन किया जाय। किसी शुभेच्छु ने सुझाव दिया था कि इस क्रम में दो एक गिद्ध भी मंच पर शोभायमान होंगे तो कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ जाएगी। मैंने इसी लिए अपने दिल्ली प्रवास के दौरान उन साथी को फोन मिलाया। लेकिन उनसे संवाद के पश्चात मैं जैसे भकुआ गया।
उन्होंने पूछा किसको किसको अपने मंच पर बुलाना चाहते हैं?
मैंने उनसे काव्य जगत के अम्बानी जी को अपनी वरीयता सूची में प्रथम स्थान पर बिठा रखा था सो उनका ही नाम ले लिया।
साथी कवि ने बड़ी सहजता से बोला, 'बीस लाख प्लस जीएसटी,।
मैंने कहा , कुछ कम मूल्य में दयावान कवियों के नाम बताइए।'
देखिए आपको अच्छा कार्यक्रम कराना है कि कविता करवानी है। अगर अच्छा कार्यक्रम करवाना है तो लगभग तीस लाख की व्यवस्था कर लीजिये। वरना आप से अच्छा कवि कौन है! अपने जैसे दस कवि बुला लीजिये।कार्यक्रम हो जायेगा।
मैंने कहा कि भाई आप ही आ जाइयेगा। उन्होंने कहा कि,' डेढ़ लाख दे दीजिएगा। मैं भी आ जाऊँगा। "
मैं चौंक गया। किन्तु उन्होंने बड़े सहज भाव से समझाया,
साहनी जी! आप को मैंने सुना हुआ है।आप बहुत अच्छे कवि हैं। लेकिन आप जिस सहजता से उपलब्ध हो जाते हैं यही आदत आपके विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं। अपने साहित्य का स्तर भी गिराइए। कुछ चुटकुले वगैरह सुनाईये।और खुद को बेचिए।अपनी ब्रांडिंग ख़ुद करिये या किसी एजेंसी से कराइये।वरना सौ साल इन्तज़ार करिये।"
और इतना कह कर उन्होंने फोन काट दिया ।
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