कभी कभी ऐसी ऐसी फ्रेंड रिक्वेस्ट आती है कि मन तीन चार दशक पीछे की ओर ऐसे भागने लगता है जैसे कि कउनो जवान बछरू कुलांच मारै। मन का मयूर कहरौवा नाच नाचने लगता है।अब एहिमा हँसने की क्या बात है! कउनो हम बुढा गये हैं क्या?
खैर यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है।जब बड़े बड़े ऋषि मुनि डोल जाते हैं तो हमारे जैसे आम की क्या बिसात कि चैत फागुन में ना बौराये।एक बार बढ़िया तो लगा। देखा कि हमारे कई विभागीय सन्तजन भी उनकी मित्र सूची में शामिल हैं। सो उनकी फिरेन्ड रिकवेस्ट स्वीकार करने के कई आधार बन रहे थे। और कवियों के बारे में यूँ कहाँ गया है कि ,"सुवरण को खोजत फिरत कवि,व्यभिचारी, चोर।।'
फिर भी जैसा कि अपनी पुरानी आदत है कि सोशल मीडिया पर हम सोच विचार जाँच पड़ताल के बाद ही मित्र बनाते हैं।सो प्रोफाइल देखा। अब क्या बताये इतनी सुंदरता देखने के बाद बुद्धि तो जैसे घास चरने चली गयी। कुछ देर बाद जब लौटी तो देखा मैदान उतना साफ नहीं है।कई और जाने पहचाने जनावर पहले से चरन्त मुद्रा में उपस्थित हैं।अतः उत्साह थोड़ा सा तो ठण्डा हुआ।लेकिन दिल तो पागल है ना सो ठीक कैसे हो एकता है।
ख़ैर शादी के तीन दशक होने वाले हैं।अब मैं भी जीजा सम्बोधन वाली स्थितियों से ऊपर उठ कर फुफ़ाओं वाली जमात में शामिल हो रहा हूँ। लेकिन चुँकि इस फ्रेंड रिक्वेस्ट आने के बाद गर्व करने वाली फीलिंग जाग गयी थी। यद्यपि अब अपने बच्चे भी पर्याप्त बड़े हो चुके हैं इस नाते भी ऐसी खुशफहमी से ख़ुद को दूर रखना चाहिये। फिर भी मन का चोर चोरी से कहाँ बाज आता है।हाँ एक अफसोस भी जगता कि तुम पहले कहाँ रहे निर्मोही! किसी शायर ने फरमाया भी है कि:-
वक़्त इससे और ज़्यादा मुझसे क्या करता मज़ाक़
दिल जवां रहने दिया और जिस्म बूढ़ा कर दिया।।
लेकिन इससे पहले कि सेलिब्रिटी बनने की खुशी में पागलपन बढ़ता कि अख़बार की एक ख़बर ने नशा हिरन कर दिया। उसमें लिखा था कि इसी नाम की छद्म आईडी के फेर में पाँच छह रक्षा कर्मी पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में धरे गये है। हमारी खुशी के सारे बुलबुले एकाएक फूट गये। और हमने इस आईडी से मित्रता का विचार त्याग दिया।
सुरेश साहनी, कानपुर
9451545132
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