ज़िन्दगी के विराम तक पहुँचे।
अन्ततः हम मक़ाम तक पहुंचे।।
इक तिरा दर नहीं मिला अब तक
जबकि हम गाम गाम तक पहुंचे।।
जब तअल्लुक़ ही तर्क है उनसे
कोई कैसे सलाम तक पहुँचे।।
उस ख़ुदा के ही इंतज़ाम हैं सब
आप किस इंतज़ाम तक पहुँचे।।
हौसले से उछालिये पत्थर
बात कुछ तो निज़ाम तक पहुँचे।।
दे रहा है वो विष ज़माने के
कोई मीरा न श्याम तक पहुँचे।।
बेख़ुदी तक वली पहुंचते हैं
शेख भी सिर्फ़ जाम तक पहुँचे।।
काश मजमून भांपते दिल का
आप बस जिस्मे-खाम तक पहुँचे।।
@highlight
सुरेश साहनी कानपुर
9451545132
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