यूँ कवियों की भीड़ बहुत है
महफ़िल महफ़िल
किंतु वास्तविक कवि हैं कितने
कहना मुश्किल
श्रोता भी अब कहाँ किसी को
जाँच रहे हैं
उधर सबल जी किसी सरल को
बाँच रहे हैं
कोई झंझट कोई करपट
कोई बेदिल
कविता का दिल तोड़ रहे हैं
सारे हिलमिल.....
सुरेश साहनी कानपुर
9451545132 हास्य व्यंग्य
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