वेदने रहो मम अन्तस् में
क्या एकाकिनि बन कर जीना
पग पग पर साथी हूँ सहचर
क्यों सन्यासिनि बन कर जीना
हो खंडित शील अहिल्या से
बन्धक मन भाव शिलाओं के
है वन अशोक में शोकाकुल
तन दग्ध विदेह सुताओं के
मम उर आश्रय है जब साथी
क्या सौदामिनि बन कर जीना....
सुरेश साहनी कानपुर
9451545132
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