पद पर जब तक रहे घूमते फिरते थे अकड़े।

सोच रहे हैं अब भी दुनिया उनके पैर पड़े।।


नहैं किसी से रामरहारी दुआ सलाम नहीं

उससे सीधे मुँह ना बोले जिससे काम नहीं

अपने मातहतों के सिर पर हरदम रहे खड़े।।


क्या मजाल थी कोई काम के लिये उन्हें टोके

हाँ टेबल के नीचे वाले काम नहीं रोके

कम वेतन में आमदनी के स्रोत मिले तगड़े।।


अफसर थे तो कदम कदम पर सेवा टहल रही

आज नहीं हैं ठसक अफसरी फिर भी मचल रही

आज मेम भी सोच रही हैं कौन धुले कपड़े।।


सुरेश साहनी कानपुर रिटायर

9451545132

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