कुछ इतने दूर तुम रहने लगे हो।

जनम के अजनबी लगने लगे हो।।


कभी बादे-सबा थे तुम हुआ क्या

ये किस अंदाज़ में बहने लगे हो।।


नहीं होता है अब इक शेर नाज़िल

तो क्या  खारिज़ हमें करने लगे हो।।


जो हमको देखकर चौंके हो जानम

ये तुम किस बात से डरने लगे हो


तुम्हें  वो साहनी भी चाहता है

कहीं तुम तो नहीं  मरने लगे हो।।


साहनी सुरेश कानपुर

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