हुये रिटायर जान रहे हैं

लेकिन पाल गुमान रहे हैं

साहब अब भी अहंकार वश

ख़ुद को साहब मान रहे हैं।।


सोच रहे हैं कल भी उनको

बाबू लोग सलामी देंगे

और मुहल्ले वाले उनको

अब भी साहब ही बोलेंगे


कितनी ठसक रही है आख़िर

वे  दफ्तर की शान रहे हैं।।


और विदाई वाला मन्ज़र

याद सुबह और शाम रहेगा

सब बोले थे जब तक धरती

है साहब का नाम रहेगा


यूँ भी उनके आगे पीछे

दस दस ठो दरबान रहे हैं।।


लेकिन इन दो चार दिनों में

बदल गया है सारा मन्ज़र

अब पड़ोस के ठलुवे इनको

समझ रहे है रंक बराबर


किंतु ख़यालों में साहब जी

अब भी ख़ुद को तान रहे हैं।।


सुरेश साहनी कानपुर

9451545132

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