क्यों भटकता तेरी राहों में रहूं।

गिर के क्यों ख़ुद की निगाहों में रहूं।।

 क्यों फिरूँ गलियों में तेरी बावला

क्यों न अपनी ही पनाहों में रहूं।।साहनी

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