गली घर द्वार में उलझा हुआ हूँ।
अभी परिवार में उलझा हुआ हूँ।।
ये जीवन नून लकड़ी तेल है क्या
जहाँ बेकार में उलझा हुआ हूँ।।
किसी को जीत कर भी क्या करूँगा
मैं अपनी हार में उलझा हुआ हूँ।।
बहुत सुंदर है ये मलमूत्र का घर
इसी आगार में उलझा हुआ हूँ।।
निकल पाता तो मिलता मृत्यु से भी
अभी दस द्वार में उलझा हुआ हूँ।।
न आएगी सुबह मधुयामिनी की
अभी अभिसार में उलझा हुआ हूँ।।
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