जीवन गोया यातना की बहुतेरी किस्म।

रूह सदा ढोती रही मन पर बोझिल जिस्म।।


दैहिक भौतिक मानसिक या फिर दैविक ताप ।

इन सब से  भारी रहे   सामाजिक सन्ताप ।।


चाहत से चिन्ता बढ़ी बड़ी व्यर्थ परवाह।

हुआ भिखारी के सदृश  मन का दौलतशाह।।

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