शब्द शब्द से हुए पराये अक्षर अक्षर से ही रूठे।
मैं भी गीत कहाँ से लिखता भाव कहाँ से लाता झूठे।।
जब तुम थे ऐसा लगता था
जैसे मुझको सब हासिल है
कविता कहना कठिन नहीं है
गीत सजाना कब मुश्किल है
ये सब मेरे खेल खिलौने छूट गए तब जब तुम छूटे।।
अक्षर ब्रम्ह जगत मिथ्या पर
शब्द सशक्त कहे जाते है
किन्तु वियोगी-पद लेते ही
भाव विरक्त हुए जाते हैं
होती सफल साधना कैसे ,सारे पुण्य समय ने लूटे।।
खण्ड खण्ड हो गयी सृजनता
महाकाव्य रह गए अधूरे
जीवन की चलती चाकी में
शेष बचे गीतों के चूरे
टेक तुम्हारी पकड़ बच गए तुलसी से दो एक अनूठे।।
सुरेशसाहनी
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