माँ की दो रोटी में जैसे
जग का प्यार छुपा रहता था
भूख नहीं होती थी तब भी
स्वतः भूख जागा करती थी
अब भी दो रोटी आती है
किंतु औपचारिकताओं से पूरित
स्नेह स्वार्थ मिश्रण अभिगुँथित
बड़े सलीके से उच्चारित
कह दो तो दो और बना दूँ
कैसे कह दूँ सोच रहा हूँ
भूख मिट गई पेट भर गया
फिर भी ऐसा क्यों लगता है
मन जैसे संतृप्त नहीं है
पढ़े लिखे हैं शिक्षित घर हैं
सुविधाओं की कमी नहीं है
अब चूल्हों में धुंआ नहीं है
सोच रहा हूँ फिर से घर मे
मिट्टी का चूल्हा ले आऊँ
माँ तेरे खुरदुरे हाथ भी
कितने नरम नरम लगते थे
शायद उनमे नेल नहीं थे
नोक नुकीले पॉलिश वाले
मां अनपढ़ थी पर अच्छी थी.....
सुरेशसाहनी, कानपुर
Comments
Post a Comment