मैं गंगा हूँ-2

तन से शीतल ,मन से निर्मल

धोती हूँ जन जन के कलिमल

शिव ने धारा है मस्तक पर

आवाहन करता है सागर

मत समझो मैं सिर्फ नदी हूँ

पाप नाशिनी विष्णुपदी हूँ...


गोमुख से गंगा सागर तक

बहती आयी हूँ निष्कंटक

भारत की  जीवन धारा हूँ

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा हूँ

तर्पण और वजू का जल हूँ

आबे-जमजम गंगाजल हूँ.....


मेरा मन तबसे टूटा है

अपनों ने मुझको लूटा है

मेरा जल चोरी होता है

प्यासों को बेचा जाता है

और मेरी अपनी संताने

बाँध रहीं जाने अनजाने.....


खुश थी मैं आयी आज़ादी

पर मुझको बेड़ी पहना दी

मैं उन्मुक्त सरल आनन्दी

अपने ही घर मे हूँ बंदी

बेटे माँ को छोड़ रहे हैं

मेरी धारा मोड़ रहे हैं.....


अब ये सांसे छूट रही है

मेरी हम्मत टूट रही है

गन्दा जहर प्रदूषित पानी

कचड़ा मलवा नाला नाली

यह विनती है सुन लो बेटों

मुझमें मिलने गिरने मत दो


सीधी ज़हर ख़ुरानी रोको

इन नालों का पानी रोको

जगह जगह मुझको मत बांधो

मेरे सब अवरोध हटा दो

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